Iran US Ceasefire
Iran US Ceasefire : दुनिया को विनाशकारी युद्ध के मुहाने पर खड़ा करने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी ही तय की गई डेडलाइन से डेढ़ घंटा पहले एक चौंकाने वाला फैसला लिया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों के लिए ‘सीजफायर’ यानी युद्ध-विराम लागू हो गया है। ट्रंप का दावा है कि विवादित मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और अगले 14 दिनों में शांति समझौते को अंतिम रूप दिया जाएगा। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान ने वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को खोलने का भरोसा दिया है, जिसके पीछे पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है।
अमेरिकी घोषणा के कुछ ही देर बाद ईरान ने भी इस युद्ध-विराम पर अपनी सहमति जता दी। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए पुष्टि की कि यदि ईरान के खिलाफ सभी हमले रुक जाते हैं, तो ईरानी सशस्त्र बल अपने रक्षात्मक अभियानों को तत्काल प्रभाव से रोक देंगे। अराघची ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के आग्रह और अमेरिका द्वारा स्वीकार किए गए ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्तावों का हवाला देते हुए इसे एक सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगले दो हफ्तों तक ईरानी सेना के समन्वय से होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों को ‘सेफ पैसेज’ दिया जाएगा।
ईरानी मीडिया के अनुसार, इस शांति प्रस्ताव में 10 मुख्य बिंदु शामिल हैं जो भविष्य के समीकरणों को बदल सकते हैं। इनमें सबसे प्रमुख ‘अहिंसा की अंतरराष्ट्रीय गारंटी’ है, ताकि भविष्य में ईरान पर आक्रमण न हो। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का संप्रभु नियंत्रण बरकरार रहेगा। प्रस्ताव में यूरेनियम संवर्धन की स्वीकृति, सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने, इजरायली हमलों को रोकने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों को समाप्त करने की मांग की गई है। सबसे बड़ी शर्त खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी लड़ाकू बलों की पूर्ण वापसी और लेबनान-गाजा में जारी संघर्ष को समाप्त करना है। इसके साथ ही, युद्ध में हुए बुनियादी नुकसान के लिए ईरान ने मुआवजे की भी मांग रखी है।
इस ऐतिहासिक समझौते के पीछे पर्दे के पीछे की कूटनीति ने बड़ा काम किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने व्यक्तिगत रूप से इस युद्ध-विराम को अपनी मंजूरी दी है। इस डील को अंतिम रूप देने में चीन ने ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाई। चीन ने अंतिम समय में हस्तक्षेप करते हुए तेहरान से “लचीलापन दिखाने” की अपील की, क्योंकि ईरान की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को लगातार हो रहे हमलों से भारी क्षति पहुँच रही थी। जहाँ पाकिस्तान ने मध्यस्थ के रूप में दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाया, वहीं चीन के कूटनीतिक दबाव ने इस समझौते को हकीकत में बदल दिया।
डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अमेरिका ने अपने सभी सैन्य उद्देश्यों को प्राप्त कर लिया है और अब वह मध्य पूर्व में स्थायी शांति चाहता है। हालांकि, यह युद्ध-विराम केवल दो हफ्तों के लिए है। इन 14 दिनों के भीतर अगर दोनों देश किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँचते, तो संघर्ष फिर से भड़क सकता है। फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस विकास को राहत की तरह देख रहा है क्योंकि इससे तेल की वैश्विक आपूर्ति बहाल होने और क्षेत्रीय तनाव कम होने की संभावना बढ़ गई है। आने वाले दो हफ्ते यह तय करेंगे कि दुनिया एक और महायुद्ध की ओर बढ़ेगी या शांति के एक नए युग की शुरुआत होगी।
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