UGC Rules 2026 : यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी UGC की ओर से जारी इक्विटी रेगुलेशंस, 2026 को लेकर शुरू हुआ विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इन नियमों को लेकर अलग-अलग वर्गों की ओर से आपत्तियां जताई गई थीं। मामला अदालत पहुंचने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों के अमल पर रोक लगा रखी है। गुरुवार को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने अदालत के सामने कहा कि वह इन नियमों की दोबारा समीक्षा कर रही है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और UGC की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार नियमों पर पुनर्विचार कर रही है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने स्पष्ट किया कि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि पुनर्विचार के बाद क्या फैसला होगा, लेकिन सरकार इन प्रावधानों की समीक्षा कर रही है। सरकार के इस रुख के बाद मामले में आगे की प्रक्रिया को लेकर तस्वीर कुछ स्पष्ट हुई है।
UGC को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने आयोग से कहा कि वह याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए सभी प्रमुख मुद्दों को ध्यान में रखते हुए जवाबी हलफनामा दाखिल करे। इसके साथ ही हलफनामे की प्रति सभी संबंधित याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं को जवाब के लिए दो सप्ताह का समय
सुप्रीम कोर्ट ने UGC का जवाब मिलने के बाद याचिकाकर्ताओं को भी अपनी प्रतिक्रिया दाखिल करने का अवसर दिया है। अदालत के निर्देश के अनुसार, UGC के जवाबी हलफनामे पर याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल कर सकेंगे। इस प्रक्रिया के बाद अदालत मामले में उठाए गए कानूनी और संवैधानिक सवालों पर आगे विचार कर सकती है।
जनवरी में सामने आया था पूरा विवाद
UGC के इन नए नियमों को लेकर विवाद इस साल जनवरी में उस समय शुरू हुआ था, जब उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से जुड़े UGC रेगुलेशंस, 2026 सामने आए। इसके बाद इन प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने नियमों के कुछ हिस्सों की वैधता और उनके संभावित प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे।
जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा पर उठे सवाल
याचिकाओं में दावा किया गया कि नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा का दायरा पर्याप्त व्यापक नहीं है। आरोप लगाया गया कि सामान्य या गैर-आरक्षित श्रेणी के विद्यार्थियों को जाति आधारित भेदभाव और संस्थागत पक्षपात से सुरक्षा देने के मामले में नियमों का दायरा सीमित हो सकता है। इसी आधार पर नियमों की संरचना और उनके संभावित प्रभाव को लेकर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई।
नियमों के संभावित दुरुपयोग पर भी चिंता
याचिकाकर्ताओं ने केवल नियमों की परिभाषाओं पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि इनके संभावित दुरुपयोग को लेकर भी चिंता जताई। उनका तर्क था कि किसी भी समानता आधारित व्यवस्था में सभी विद्यार्थियों के लिए निष्पक्ष और समान सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। इसी वजह से नियमों के विभिन्न प्रावधानों की संवैधानिकता और उनके व्यावहारिक प्रभाव की समीक्षा की मांग की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले लगाई थी रोक
मामला अदालत में पहुंचने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने UGC के इन नियमों के प्रभावी होने पर रोक लगा दी थी। इसके चलते फिलहाल विवादित प्रावधानों को लागू नहीं किया जा रहा है। अब केंद्र सरकार की ओर से नियमों पर पुनर्विचार किए जाने के बयान के बाद यह मामला नए चरण में पहुंच गया है।
आगे की सुनवाई पर टिकी नजरें
अब UGC को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा, जबकि याचिकाकर्ताओं को उसके बाद दो सप्ताह का समय मिलेगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट नियमों की वैधता, दायरे और उठाई गई आपत्तियों पर आगे सुनवाई करेगा। फिलहाल सरकार का पुनर्विचार वाला रुख इस पूरे विवाद में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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