UP Election 2027
UP Election 2027: चुनावी बिसात और सपा का 10 साल का वनवास उत्तर प्रदेश की सियासत में विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने में अभी वक्त है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) ने अभी से अपनी घेराबंदी शुरू कर दी है। 2024 के लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के बाद, अखिलेश यादव का आत्मविश्वास चरम पर है। वह 10 साल के ‘सियासी वनवास’ को खत्म कर लखनऊ की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए बेताब हैं। इसी सिलसिले में राजधानी लखनऊ के पार्टी मुख्यालय में अखिलेश यादव ने सांसदों के साथ एक हाई-प्रोफाइल बैठक की, जिसने प्रदेश के राजनैतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
अखिलेश यादव ने लखनऊ में अपने सभी 37 लोकसभा सांसदों और 4 राज्यसभा सांसदों के साथ गहन मंथन किया। इस बैठक का मुख्य एजेंडा ‘मिशन 2027’ के लिए एक अभेद्य किला तैयार करना था। अखिलेश ने स्पष्ट किया कि 2024 की जीत सिर्फ एक शुरुआत थी, असली परीक्षा विधानसभा चुनावों में होगी। उन्होंने सांसदों को बताया कि उनकी भूमिका केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा सीट पर समाजवादी झंडा बुलंद करने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना होगा।
बैठक में अखिलेश यादव ने बेहद पेशेवर रुख अपनाते हुए सभी सांसदों से उनके संसदीय क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। सांसदों को ‘SIR’ (वोटर लिस्ट पुनरीक्षण एवं निगरानी) प्रक्रिया पर कड़ी नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई है। अखिलेश का मानना है कि बूथ स्तर पर मजबूती ही जीत की असली कुंजी है। सांसदों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर सरकार की विफलताओं को जनता तक पहुँचाएँ और संगठन की कमियों को दूर करें।
सपा प्रमुख ने सांसदों को न केवल उनके संसदीय क्षेत्रों बल्कि पड़ोसी सीटों पर भी पकड़ मजबूत करने का टास्क सौंपा है। औसतन एक लोकसभा क्षेत्र में 5 से 6 विधानसभा सीटें आती हैं। अखिलेश ने रणनीतिक रूप से सांसदों को इन सीटों का ‘कस्टोडियन’ बनाया है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके क्षेत्र की हर सीट पर पार्टी का कैडर सक्रिय रहे। साथ ही, आगामी संसद के बजट सत्र में केंद्र और राज्य सरकार को किन मुद्दों पर घेरना है, इसकी पटकथा भी इसी बैठक में लिखी गई।
2027 में टिकट वितरण के लिए सपा इस बार किसी भी तरह की जल्दबाजी या सिफारिश के मूड में नहीं है। अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के अपने सफल नारे को और अधिक मजबूती से लागू करने जा रहे हैं। उम्मीदवारों के चयन के लिए पार्टी आंतरिक सर्वे और सांसदों की रिपोर्ट का सहारा लेगी। टिकट उसी को मिलेगा जिसका जातीय समीकरण और स्थानीय सपोर्ट बेस सबसे मजबूत होगा। इस बार दावेदारों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए कड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।
अखिलेश यादव की इस सक्रियता ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सहित अन्य विरोधी दलों को सतर्क कर दिया है। जहाँ बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की योजना बना रही है, वहीं सपा का यह ‘कॉर्पोरेट स्टाइल’ इलेक्शन मैनेजमेंट चौंकाने वाला है। यदि अखिलेश अपने सांसदों से मिली रिपोर्ट और PDA के समीकरण को सही ढंग से जमीन पर उतारने में सफल रहे, तो 2027 का मुकाबला वाकई ऐतिहासिक होगा।
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