Russia-Iran Oil Sanctions
Russia-Iran Oil Sanctions : वाशिंगटन से आई एक बड़ी खबर ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि वह रूस और ईरान के कच्चे तेल पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई ढील या छूट की अवधि को आगे नहीं बढ़ाएगा। अमेरिकी सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह छूट एक निश्चित समय के लिए और विशेष परिस्थितियों में दी गई थी, जिसका उद्देश्य केवल युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में आई बाधाओं को दूर करना था। इस फैसले के बाद अब रूस और ईरान से तेल खरीदना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भी जटिल हो जाएगा, जिससे आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि अमेरिका समुद्री मार्ग से आने वाले ईरानी और रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में दी गई छूट का नवीनीकरण नहीं करेगा। बेसेंट के मुताबिक, ईरानी तेल पर छूट इसी सप्ताह समाप्त हो रही है, जबकि रूसी तेल पर मिलने वाली राहत भी सप्ताहांत तक खत्म हो जाएगी। उन्होंने आगे विस्तार से बताते हुए कहा, “हम रूसी और ईरानी तेल के लिए सामान्य लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करेंगे। यह वह तेल था जो 11 मार्च से पहले समुद्री परिवहन में था और अब वह सब इस्तेमाल हो चुका है।” अमेरिका के इस कड़े रुख से साफ है कि वह ऊर्जा बाजार में रूस और ईरान की घेराबंदी तेज करने जा रहा है।
अमेरिका के इस फैसले से भारत की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। अब तक भारत अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंधों में छूट का भरपूर फायदा उठा रहा था। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, इस रियायत का लाभ उठाते हुए भारत ने रूस से लगभग 3 करोड़ बैरल कच्चे तेल का ऑर्डर दिया था। इसके अलावा, मार्च में शुरू की गई विशेष छूट के तहत ईरान को भी 20 मार्च से पहले लोड किए गए करीब 14 करोड़ बैरल तेल बेचने की अनुमति मिली थी। भारत इन दोनों देशों से कम कीमत पर तेल आयात कर अपने घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास कर रहा था, लेकिन अब इस आपूर्ति श्रृंखला पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
अमेरिकी वित्त विभाग ने 12 मार्च को भारतीय रिफाइनरियों के लिए 30 दिनों की विशेष छूट जारी की थी। उस समय अमेरिका का तर्क था कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करना आवश्यक है। अमेरिका ने इसे एक ‘अल्पकालिक और जानबूझकर उठाया गया कदम’ बताया था। राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन का मानना था कि समुद्र में पहले से लोड हो चुके तेल के लेन-देन को अधिकृत करने से रूसी सरकार को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा, बल्कि इससे वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बनी रहेगी। हालांकि, अब यह समय सीमा पूरी हो चुकी है और अमेरिका अपनी पुरानी सख्त नीति पर वापस लौट रहा है।
अमेरिका ने भारत को अपना “अत्यावश्यक और रणनीतिक साझेदार” बताते हुए उम्मीद जताई है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी या ईरानी तेल के बजाय अमेरिकी कच्चे तेल को अधिक प्राथमिकता देगा। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी ऊर्जा निर्भरता उन देशों से कम करे जिन पर कड़े प्रतिबंध लगे हुए हैं। भारत के लिए यह एक कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती है, क्योंकि उसे अपने विकास के लिए किफायती तेल की निरंतर आवश्यकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय सरकार अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के इस नए दबाव और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच क्या संतुलन बनाती है।
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