VB-G-RAM-G Bill
VB-G-RAM-G Bill: भारत के ग्रामीण विकास और रोजगार ढांचे में आज एक युगांतरकारी बदलाव हुआ है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी बिल, 2025 (VB-G-RAM-G) को अपनी आधिकारिक स्वीकृति दे दी है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही अब यह विधेयक कानून का रूप ले चुका है। यह नया कानून पिछले दो दशकों से ग्रामीण भारत की रीढ़ रहे ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (MGNREGA) का स्थान लेगा। सरकार का मानना है कि यह नया मिशन विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने में सहायक होगा, हालांकि विपक्ष इसे लेकर हमलावर है।
इस विधायी बदलाव पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। चेन्नई में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चिदंबरम ने कहा कि योजना के नाम से महात्मा गांधी का नाम हटाना उनकी दोबारा हत्या करने जैसा है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “गांधी जी की पहली हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी, और अब भाजपा सरकार उनके नाम को मिटाकर उन्हें दोबारा मार रही है।” चिदंबरम ने तंज कसा कि भले ही सरकार आधिकारिक रिकॉर्ड से गांधी और नेहरू को मिटा दे, लेकिन वे जनता के दिलों में बुद्ध और यीशु की तरह बसे हुए हैं।
चिदंबरम ने नए कानून के नाम VB-G-RAM-G पर भी कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा जटिल नाम दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों की समझ से बिल्कुल परे है। उन्होंने संदेह जताया कि शायद खुद केंद्रीय मंत्रियों को भी इस नाम का सटीक अर्थ स्पष्ट न हो। सबसे बड़ी चिंता उन्होंने इस शर्त पर जताई कि यदि राज्य सरकारें अपनी क्षेत्रीय भाषा में इस सटीक नाम (जी राम जी) का उपयोग नहीं करती हैं, तो केंद्र सरकार उन्हें फंड जारी नहीं करेगी।
नए कानून के तहत योजना के स्वरूप में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब यह ‘यूनिवर्सल’ नहीं रहेगी। मनरेगा का मूल ढांचा हर ग्रामीण जिले तक फैला हुआ था, लेकिन नया कानून केवल केंद्र द्वारा चुने गए कुछ विशिष्ट जिलों तक ही सीमित रहेगा। चिदंबरम ने इसे योजना के मूल उद्देश्य के विपरीत बताया। इसके अलावा, नए प्रावधानों के अनुसार अब शहरी या कस्बों के अंतर्गत आने वाले पंचायत क्षेत्रों को इस योजना से बाहर कर दिया गया है, जिससे लाभार्थियों की संख्या में बड़ी कमी आने की आशंका है।
पुराने मनरेगा कानून में केंद्र सरकार मजदूरी की पूरी लागत और सामग्री (Material) खर्च का 75 प्रतिशत हिस्सा वहन करती थी। लेकिन नए कानून में फंडिंग की जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा राज्यों के पाले में डाल दिया गया है। अब राज्यों को खर्च में अपनी हिस्सेदारी देनी अनिवार्य होगी। चिदंबरम ने चेतावनी दी कि यदि कोई गरीब राज्य यह कहता है कि उसके पास पर्याप्त फंड नहीं है, तो वहां यह योजना लागू ही नहीं होगी, जिससे लाखों ग्रामीण बेरोजगार हो जाएंगे।
सरकार ने दावा किया है कि नए कानून के तहत काम के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया जाएगा। चिदंबरम ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि वर्तमान में राष्ट्रीय औसत केवल 50 दिन का है। वास्तविकता यह है कि बहुत कम मजदूर मौजूदा 100 दिनों का कोटा पूरा कर पाते हैं। ऐसे में बिना जमीनी बजट बढ़ाए कागजों पर 125 दिन का वादा करना जनता को गुमराह करने जैसा है।
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