Vishnu Puja Panchamrit : सनातन धर्म शास्त्रों और पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्रीहरि विष्णु को इस चराचर जगत का पालनहार यानी ‘जगपालक’ बताया गया है। भगवान विष्णु ने समय-समय पर अधर्म का नाश करने और संसार के कल्याण के लिए अनेक अलौकिक अवतार लिए हैं। हिंदू कैलेंडर में आने वाली प्रत्येक एकादशी तिथि भगवान विष्णु की साधना को समर्पित की गई है। ऐसी सुदृढ़ धार्मिक मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु निष्ठापूर्वक एकादशी का व्रत रखता है, उसे मृत्यु के बाद जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलकर मोक्ष और बैकुंठ धाम में सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है। यही वजह है कि भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना बहुत ही विशेष, नियमबद्ध और सात्विक तरीके से की जाती है।

बिना पंचामृत अधूरी रहती है श्रीहरि की कोई भी महापूजा
भगवान विष्णु से जुड़ा कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, कथा या विशेष पूजा का आयोजन तब तक संपूर्ण नहीं माना जाता, जब तक कि उन्हें पंचामृत का दिव्य भोग न लगाया जाए। बिना पंचामृत के विष्णु जी की पूजा को अधूरा और अपूर्ण माना गया है, और ऐसी पूजा का पूर्ण फल भी भक्त को प्राप्त नहीं होता है। पंचामृत का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अत्यंत व्यापक है। भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की कथा से लेकर उनके श्री कृष्ण अवतार तक की हर छोटी-बड़ी पूजा में पंचामृत को मुख्य भोग के रूप में अर्पित करने की परंपरा प्राचीन काल से अनवरत चली आ रही है।

जानिए क्या है पंचामृत और इसके पांच चमत्कारी तत्व
‘पंचामृत’ शब्द का अर्थ ही है पांच अमृत तुल्य पवित्र चीजों का मिश्रण। ये पांचों सामग्रियां अपने आप में अत्यंत शुभ, शुद्ध और औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती हैं, जिनका धर्म शास्त्रों में विशेष स्थान है। पंचामृत तैयार करने के लिए मुख्य रूप से पांच चीजों की आवश्यकता होती है: शुद्ध गाय का कच्चा दूध, ताजा दही, गाय का घी, प्राकृतिक शहद और मिश्री या शक्कर। इन सभी सामग्रियों को एक निश्चित और शास्त्रसम्मत मात्रा में मिलाकर यह पावन भोग तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे चांदी, तांबे या मिट्टी के एक अत्यंत शुद्ध पात्र में रखकर भगवान के सम्मुख अर्पण किया जाता है।
तुलसी दल का विशेष नियम और भूलकर भी न करें अपमान
जब भी भगवान विष्णु या उनके किसी भी अवतार (जैसे श्री कृष्ण या श्री राम) को पंचामृत अर्पित किया जाता है, तो उसमें तुलसी के पत्ते (तुलसी दल) डालना अनिवार्य होता है। मान्यताओं के अनुसार, बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु पंचामृत या संसार का कोई भी अन्य छप्पन भोग स्वीकार नहीं करते हैं। इसके साथ ही, शास्त्रों में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि पंचामृत का कभी भी अनादर या अपमान नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अज्ञानता या अहंकार में पंचामृत का अपमान करता है या उसे व्यर्थ फेंकता है, उसके संचित पुण्य नष्ट हो जाते हैं और उसके पापों में भारी वृद्धि होती है।
पंचामृत बनाने के अचूक नियम और शुद्धता की शर्तें
पंचामृत तैयार करते समय कुछ बेहद कड़े और पारंपरिक नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। शास्त्रों के अनुसार, पूजा के लिए पंचामृत हमेशा सूर्यास्त होने से पहले ही बना लेना चाहिए। इसे बनाने के लिए केवल और केवल देशी गाय के दूध और उससे बने उत्पादों (दही, घी) का ही उपयोग किया जाना चाहिए, भैंस या पैकेट के दूध का प्रयोग वर्जित है। इसके अलावा, पंचामृत की पवित्रता को बढ़ाने के लिए उसमें तुलसी की पत्तियों के साथ-साथ पवित्र गंगाजल की कुछ बूंदें भी अवश्य डालनी चाहिए, जिससे वह पूरी तरह सिद्ध हो जाता है।
पंचामृत ग्रहण करने की सही विधि और जरूरी सावधानियां
भगवान का चरणामृत या पंचामृत ग्रहण करते समय भक्तों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। पंचामृत को हमेशा अंजलि बनाकर यानी दोनों हाथों को एक साथ जोड़कर पूरी श्रद्धा के साथ लेना चाहिए। इसे पीते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि इसकी एक भी बूंद भूलवश जमीन या भूमि पर न गिरे, क्योंकि इसे बेहद अशुभ माना जाता है। पंचामृत को पूरी तरह ग्रहण करने के बाद, प्रसाद लगे हुए दोनों गीले हाथों को अपने सिर या शिखा के स्थान पर स्पर्श करना चाहिए। ऐसा करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और ईश्वर का आशीर्वाद सदैव बना रहता है।
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