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Indian Economy: डॉलर की सुनामी में बहा रुपया, महंगाई दर 5% पार करने की डरावनी आहट

Indian Economy: पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था की जड़ों पर पड़ने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी और वैश्विक अनिश्चितता के माहौल ने भारतीय मुद्रा ‘रुपया’ को बैकफुट पर धकेल दिया है। हालात यह हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है और अब यह $93$ प्रति डॉलर के बेहद चिंताजनक स्तर के करीब पहुँच चुका है। मुद्रा की इस गिरावट ने विदेशी निवेशकों के बीच घबराहट पैदा कर दी है, जिससे घरेलू शेयर बाजारों में भी अस्थिरता देखी जा रही है। यदि मुद्रा का अवमूल्यन इसी गति से जारी रहा, तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी दबाव में आ सकता है।

महंगाई दर में रिकॉर्ड उछाल: 10 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंची दर

आर्थिक मोर्चे पर भारत के लिए एक और बुरी खबर यह है कि देश में खुदरा महंगाई दर ने पिछले दस महीनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में व्यवधान और आयातित सामानों की बढ़ती लागत के कारण दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का चेतावनी भरा लहजा है कि अगर ईरान-इजरायल संकट लंबा खिंचता है, तो यह महंगाई आम आदमी की थाली और उसकी बचत पर सीधा प्रहार करेगी। हालांकि, वर्तमान में उपभोक्ताओं पर इसका बहुत अधिक प्रभाव महसूस नहीं हो रहा है, लेकिन आने वाले हफ्तों में परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने से रोजमर्रा के खर्चों में भारी इजाफा होना तय माना जा रहा है।

ईंधन और रसोई गैस की कीमतों में संभावित बढ़ोत्तरी

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80% से अधिक हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ‘ब्रेंट क्रूड’ (Brent Crude) की कीमतें यदि $100$ डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर जाती हैं, तो सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के लिए पेट्रोल और डीजल की मौजूदा कीमतें बरकरार रखना असंभव हो जाएगा। ईंधन के दाम बढ़ने का सीधा मतलब है माल ढुलाई का महंगा होना, जिससे सब्जी, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ़ जाएंगे। इसके साथ ही, कमर्शियल और घरेलू गैस सिलेंडरों की कीमतों में भी संशोधन की आशंका गहरा गई है, जो बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है।

आयातित सामान और विदेशी सेवाओं पर बढ़ता वित्तीय बोझ

रुपये की कमजोरी का अर्थ है कि अब भारत को उतना ही सामान खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे न केवल इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, मोबाइल और लैपटॉप महंगे होंगे, बल्कि औद्योगिक कच्चा माल और कंपोनेंट्स की लागत भी बढ़ जाएगी। इसके अलावा, जो भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके लिए फीस भरना अब पहले से कहीं अधिक खर्चीला हो जाएगा। विदेश यात्रा की योजना बना रहे पर्यटकों को भी फ्लाइट टिकटों और होटल बुकिंग के लिए अधिक भुगतान करना होगा। यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के सब्सक्रिप्शन की कीमतें भी रुपये के गिरने से प्रभावित हो सकती हैं।

रिजर्व बैंक की चुनौती: ईएमआई और ब्याज दरों का भविष्य

बढ़ती महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। मध्यम वर्ग को उम्मीद थी कि केंद्रीय बैंक आने वाले समय में रेपो रेट में कटौती करेगा, जिससे उनके होम लोन और कार लोन की ईएमआई (EMI) कम होगी। लेकिन, महंगाई के $10$ महीने के उच्च स्तर पर पहुँचने के बाद, आरबीआई को ब्याज दरों में कटौती के फैसले को टालना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में, ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं, जिससे कर्ज लेना महंगा बना रहेगा। कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया का संकट केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के हर घर के बजट को प्रभावित करने वाला एक गंभीर आर्थिक खतरा बन गया है।

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