West Bengal Elections:
West Bengal Elections : बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बाद, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपना अगला बड़ा लक्ष्य पश्चिम बंगाल तय कर लिया है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात का ऐलान किया था कि अब पार्टी का ध्यान बंगाल में जीत पर केंद्रित होगा। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा बिहार में सफल रहे अपने चुनावी फॉर्मूले के दम पर बंगाल की राजनीतिक जंग जीत सकती है?
राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से बंगाल, बिहार से काफी भिन्न है। राज्य में सीधा मुकाबला भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच है। पिछले तीन महत्वपूर्ण चुनावों—2019 लोकसभा, 2021 विधानसभा और 2024 लोकसभा—के नतीजों ने भाजपा को अपनी पुरानी रणनीति पर पुनर्विचार करने और एक नई राह तलाशने पर मजबूर कर दिया है।
बीते तीन चुनावों के परिणाम भाजपा के लिए एक स्पष्ट संदेश हैं कि केवल हिंदू राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनावी जीत हासिल करना बंगाल में आसान नहीं है।
2019 लोकसभा चुनाव: यह भाजपा का सबसे शानदार प्रदर्शन था, जब उसने राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 पर जीत हासिल की और 40.25% वोट शेयर प्राप्त किया।
2021 विधानसभा चुनाव: पार्टी इस गति को बरकरार नहीं रख पाई। सीटों की संख्या घटकर 77 रह गई और वोट प्रतिशत भी गिरकर 27.81% हो गया। हालांकि, 2016 के विधानसभा चुनावों की तुलना में यह प्रदर्शन फिर भी बेहतर था।
2024 लोकसभा चुनाव: इस चुनाव में भाजपा की सीटें और कम होकर 12 पर आ गईं, जबकि वोट प्रतिशत मामूली रूप से 39.10% रहा।
इन नतीजों से स्पष्ट है कि टीएमसी लगातार दो चुनावों (2021 और 2024) में 2019 के अपने प्रदर्शन को दोहराने में सफल रही है या उससे आगे निकल गई है। यह स्थिति भाजपा के लिए चिंता का विषय है, जिसने 2019 में बड़ी छलांग लगाई थी।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा अब समझ चुकी है कि बंगाल की राजनीति बिहार और उत्तर प्रदेश से बहुत अलग है।
जातिगत राजनीति का अभाव: बंगाल में चुनाव के दौरान जातिगत समीकरण उतना महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है, जितना कि हिंदी भाषी राज्यों में होता है।
धार्मिक आबादी की भूमिका: राज्य में करीब 30% मुस्लिम आबादी रहती है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नए फॉर्मूले की आवश्यकता: भाजपा नेताओं के हवाले से कहा गया है कि बंगाल में जीत के लिए क्षेत्रीय और धार्मिक समीकरणों में संतुलन बैठाने की आवश्यकता है।
बंगाल में लंबे समय से, 2011 से, ममता दीदी सत्ता में हैं, और उनकी पकड़ को तोड़ने के लिए एक अलग, अधिक सूक्ष्म रणनीति की जरूरत है।
बिहार चुनाव में भाजपा ने घुसपैठ को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। हालांकि, बंगाल में पार्टी अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है।
एसआईआर (SIR) का संदर्भ: इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि इस वक्त पश्चिम बंगाल में एसआईआर (संभवतः ‘स्ट्रैटेजिक इनसाइट रिपोर्ट’ या सर्वेक्षण) चल रहा है। बिहार में इसी तरह के सर्वेक्षण ने घुसपैठ को एक बड़ा मुद्दा बनाने में मदद की थी।
बंगाल में अलग रुख: बंगाल में भाजपा घुसपैठियों, जिहाद और रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ अपने रुख को बरकरार रखे हुए है, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर रही है कि वह ‘राष्ट्रवादी इंडियन मुस्लिमों’ के खिलाफ नहीं है।
सफाई देने का कारण: बिहार चुनाव में जीत के तुरंत बाद भी, शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सफाई दी कि टीएमसी द्वारा बनाई गई ‘भाजपा मुस्लिम विरोधी है’ की धारणा गलत है।
भाजपा के नेता स्पष्ट कर रहे हैं कि उनका विरोध केवल घुसपैठियों से है, न कि भारत के प्रति वफादार मुस्लिम समुदाय से। हालांकि, टीएमसी और वाम दलों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है कि ‘राष्ट्रवादी’ कौन है और कौन नहीं, यह भाजपा कैसे तय कर सकती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं।
मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें: राज्य की केवल 40 से 50 सीटों पर ही मुस्लिम समुदाय बेहद प्रभावी है। इन सीटों को नजरअंदाज करना भी एक विकल्प हो सकता है।
‘जीत-हार तय करने वाली’ सीटें: असली चुनौती उन सीटों पर है, जहां मुस्लिम आबादी इतनी मजबूत नहीं है, लेकिन जीत-हार तय करने में उनकी भूमिका अहम होती है।
लक्ष्य: असंतुष्ट मुस्लिम वोटर: भाजपा की नई रणनीति उन मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने की है जो किसी कारण से ममता दीदी और टीएमसी से नाराज़ चल रहे हैं। ये वोटर पारंपरिक रूप से कांग्रेस या वाम दलों को वोट करते रहे हैं।
पार्टी के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष, समिक भट्टाचार्य के बयानों को भी इसी रणनीति के तहत देखा जा रहा है। उन्होंने राजनीतिक हिंसा में मुस्लिम समुदाय के लोगों की कथित तौर पर अधिक मौत होने का मुद्दा उठाया है और मुस्लिमों से मंदिर-मस्जिद की पुरानी कहानियों से ऊपर उठकर विकास की राजनीति पर ध्यान देने का आग्रह किया है।
भाजपा अब मुस्लिम समुदाय को केवल एक वोट बैंक के रूप में नहीं, बल्कि एक भागीदार के रूप में संबोधित करने का प्रयास कर रही है। विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी मुस्लिमों को लेकर अपना रुख नरम किया है, भले ही वह लगातार टीएमसी पर ‘एंटी हिंदू’ होने का आरोप लगाते रहे हों।
संक्षेप में, 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति ‘फॉर्मूला बिहार’ से हटकर, बंगाल केंद्रित है:
हिंदू राष्ट्रवाद को बनाए रखना, लेकिन इसे एकमात्र मुद्दा नहीं बनाना।
घुसपैठ विरोधी रुख को नरम किए बिना, ‘राष्ट्रवादी भारतीय मुस्लिमों’ को साधने का प्रयास करना।
टीएमसी से असंतुष्ट मुस्लिम वोटरों को कांग्रेस और वाम दलों से अपनी ओर खींचना।
जाति के बजाय क्षेत्रीय और धार्मिक समीकरणों में संतुलन साधना।
भाजपा का मानना है कि इन सीटों पर जीत हासिल करके ही वह 2021 और 2024 के चुनावों में हुई हार को पलट सकती है, और 2026 में ममता बनर्जी को सत्ता से हटाकर ‘मिशन बंगाल’ को पूरा कर सकती है।
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