Wheat Yellowing Cause
Wheat Yellowing Cause: देश के अधिकतर किसानों की गेहूं की बुवाई हो चुकी है, लेकिन इन दिनों गेहूं की पत्तियों का पीला पड़ना किसानों के लिए एक आम और परेशान करने वाली समस्या बन गई है। अक्सर, किसान इस समस्या का सही कारण नहीं जान पाते और इसे रोग समझकर तुरंत कीटनाशक (Pesticide) का छिड़काव कर देते हैं। इससे फसल की लागत अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है और कई मामलों में अपेक्षित लाभ भी नहीं मिलता है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) की असिस्टेंट प्रोफेसर (एग्रोनॉमी) प्रभजीत कौर के अनुसार, असली कारण की पहचान करना और समय पर सटीक कदम उठाना बहुत जरूरी है। यह न केवल अनावश्यक खर्चों से बचाता है, बल्कि उच्च पैदावार भी सुनिश्चित करता है। इसलिए, हम गेहूं के पीले पड़ने की समस्या को लेकर विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए बेहद असरदार समाधानों पर चर्चा कर रहे हैं।
प्रभजीत कौर बताती हैं कि गेहूं के पीले पड़ने के कई अहम कारण हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं: पोषक तत्वों की कमी, पानी की कमी या अधिकता, मिट्टी की खराब सेहत, कीड़ों का हमला, और पीली रतुआ (Yellow Rust) जैसी बीमारियाँ।
मौसम और पानी की स्थिति: सर्दियों में तापमान में अचानक गिरावट या लगातार कोहरा पत्तियों का रंग बदल सकता है। हालाँकि, यह स्थिति अक्सर कुछ ही दिनों में अपने आप ठीक हो जाती है।
पानी का ज़्यादा होना (जलजमाव): सिंचाई या बारिश के बाद खेत में ज़्यादा पानी इकट्ठा होने से जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे पत्तियाँ पीली पड़कर सूखने लगती हैं। यह समस्या खासकर भारी मिट्टी में होती है।
समाधान: इससे बचने के लिए, किसानों को भारी मिट्टी में प्रति एकड़ आठ प्लॉट और हल्की मिट्टी में 16 प्लॉट बनाने चाहिए और रुके हुए पानी को तुरंत निकालना चाहिए।
खराब गुणवत्ता का पानी: खारे (Saline) ट्यूबवेल का पानी भी पीलापन पैदा कर सकता है।
समाधान: पानी इस्तेमाल करने से पहले उसकी जाँच करवानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर जिप्सम डालना चाहिए। खारे पानी को अच्छे पानी के साथ मिलाकर भी नुकसान को कम किया जा सकता है।
पोषक तत्वों की कमी गेहूं के पीले पड़ने का एक और बड़ा कारण है।
नाइट्रोजन की कमी: यह सबसे आम कमी है, जो सबसे पहले पुराने पत्तों में दिखाई देती है। पत्तियाँ सिरे से नीचे की ओर पीली पड़ने लगती हैं।
समाधान: इसे यूरिया के सही इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है। क्षारीय या खारी मिट्टी में मिट्टी परीक्षण की सिफारिशों के अनुसार 25 प्रतिशत अतिरिक्त नाइट्रोजन मिलाना चाहिए।
जिंक की कमी: प्लांट पैथोलॉजी डिपार्टमेंट के हरविंदर सिंह बुट्टर बताते हैं कि जिंक की कमी से पौधे छोटे रह जाते हैं, ग्रोथ धीमी हो जाती है और बीच की पत्तियाँ सफेद धारियों के साथ पीली पड़ जाती हैं।
समाधान: बुवाई के समय प्रति एकड़ 25 किलो जिंक सल्फेट डालें या ग्रोथ के दौरान 0.5% जिंक सल्फेट का घोल स्प्रे करें।
मैंगनीज की कमी: इससे पत्तियों की नसों के बीच पीलापन आता है, अक्सर इसमें ग्रे या गुलाबी धारियाँ भी होती हैं।
समाधान: पहली सिंचाई के बाद मैंगनीज सल्फेट का छिड़काव करने से मदद मिलती है।
सल्फर की कमी: रेतीली मिट्टी में आम है, नई पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं जबकि पुरानी पत्तियाँ हरी रहती हैं।
समाधान: प्रति एकड़ जिप्सम या बेंटोनाइट सल्फर डालने से समस्या ठीक होती है, लेकिन जिप्सम हमेशा सिंचाई के बाद ही डालना चाहिए।
PAU के एक्सपर्ट संजीव कुमार कटारिया बताते हैं कि कीड़े और बीमारियाँ भी पीलेपन का कारण बनती हैं:
दीमक: बुवाई के बाद दीमक के हमले से पौधे पीले पड़ जाते हैं, सूख जाते हैं और आसानी से उखड़ जाते हैं।
समाधान: बुवाई से पहले बीज का उपचार करें या नम रेत में फिप्रोनिल या क्लोरपाइरीफॉस मिलाकर खेत में डालें।
गुलाबी तना छेदक: लार्वा तनों में छेद कर देते हैं, जिससे पौधे पीले पड़ जाते हैं।
समाधान: किसानों को संक्रमित खेतों में अक्टूबर में बुवाई से बचना चाहिए, दिन में सिंचाई करनी चाहिए और संक्रमण ज़्यादा होने पर बताए गए कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए।
नेमाटोड्स: इनकी वजह से पौधे छोटे रह जाते हैं, पीले पड़ जाते हैं और जड़ों में गांठें बन जाती हैं।
समाधान: मैनेजमेंट में मई-जून में खेतों की जुताई करना, संक्रमित इलाकों में गेहूं बोने से बचना और बुवाई के समय फ्यूराडान डालना शामिल है।
पीली रतुआ बीमारी (Yellow Rust): पत्तियों पर पीले पाउडर जैसे दाने बन जाते हैं।
समाधान: प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करें और दिसंबर के मध्य से निगरानी शुरू करें। कैप्तान + हेक्साकोनाज़ोल, टेबुकोनाज़ोल, या प्रोपिकोनाज़ोल जैसे फफूंदनाशकों का छिड़काव करें। कटारिया ने सलाह दी कि स्प्रे केवल प्रभावित हिस्सों पर ही किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि किसान पत्तियाँ पीली होने का कारण जाने बिना जल्दबाजी में कीटनाशक का छिड़काव न करें। समय पर सिंचाई, मिट्टी की जाँच, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और कीटों तथा बीमारियों की लगातार निगरानी गेहूं के खेतों को स्वस्थ रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
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