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Ladakh Statehood Demand: लद्दाख में आर-पार की जंग, छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य के लिए लेह एपेक्स बॉडी का भारी शक्ति प्रदर्शन

Ladakh Statehood Demand: लद्दाख के भविष्य और संवैधानिक अधिकारों को लेकर लेह और कारगिल के लोगों का संघर्ष एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। पिछले छह वर्षों से केंद्र शासित प्रदेश के रूप में रह रहे लद्दाख के नागरिक अब ‘पूर्ण राज्य का दर्जा’ और ‘छठी अनुसूची’ के तहत सुरक्षा उपायों की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के नेतृत्व में आयोजित इस विशाल विरोध प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य लद्दाख की अद्वितीय संस्कृति, भूमि और पर्यावरण को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना है। स्थानीय लोगों का मानना है कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के अभाव में उनके अधिकारों का हनन हो रहा है और अब यह आंदोलन न्याय की बहाली के लिए एक जनक्रांति का रूप ले चुका है।

सोनम वांगचुक की रिहाई और एनएसए का विवाद

इस आंदोलन के बीच एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब केंद्र सरकार ने जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख के प्रमुख चेहरे सोनम वांगचुक पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) को रद्द कर उन्हें रिहा करने का फैसला किया। शनिवार को हुई इस कार्रवाई को सरकार द्वारा आंदोलनकारियों को शांत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा था। लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लकरुक ने वांगचुक की रिहाई का स्वागत करते हुए इसे लद्दाख की जनता की नैतिक जीत बताया है। उन्होंने कहा कि एनएसए हटाए जाने से यह साबित हो गया है कि वांगचुक पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद थे, जिससे लद्दाख के लोगों को बड़ा सम्मान और राहत मिली है।

विरोध प्रदर्शन जारी रखने का सामूहिक निर्णय

हालांकि सरकार ने सोनम वांगचुक को रिहा कर दिया, लेकिन लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष की रिहाई तक सीमित नहीं है। नेतृत्व ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि 16 मार्च को निर्धारित विशाल विरोध प्रदर्शन अपने तय कार्यक्रम के अनुसार ही होगा। एपेक्स बॉडी के मुताबिक, आंदोलन की मूल मांगें—जिनमें लद्दाख के लिए विशेष संवैधानिक सुरक्षा उपाय शामिल हैं—अभी भी अनसुनी हैं। कारगिल और लेह के नेतृत्व ने आपसी चर्चा के बाद यह संदेश दिया कि जब तक ठोस संवैधानिक समाधान नहीं मिलता, तब तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी रहेगा।

प्रशासनिक अपील और नेतृत्व का कड़ा रुख

विरोध प्रदर्शन की गंभीरता को देखते हुए लद्दाख के उपराज्यपाल (LG) ने आंदोलनकारी नेताओं से संपर्क साधकर 16 मार्च के प्रदर्शन को रद्द करने की अपील की थी। सरकारी तंत्र की कोशिश थी कि बातचीत के जरिए स्थिति को संभाला जाए। हालांकि, एपेक्स बॉडी के नेताओं ने उपराज्यपाल को दो टूक शब्दों में कहा कि विरोध प्रदर्शन वापस लेने का फैसला कोई व्यक्ति अकेले नहीं ले सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह जनता का आंदोलन है और इसमें सभी हितधारकों और संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा करना अनिवार्य है। नेतृत्व ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जनता की भावनाओं को सर्वोपरि रखा।

लद्दाख के भविष्य के लिए संवैधानिक सुरक्षा की जरूरत

लद्दाख के लोगों की मुख्य चिंता उनकी पहचान और संसाधनों के संरक्षण को लेकर है। छठी अनुसूची की मांग इसलिए की जा रही है ताकि यहां के जनजातीय समाज को अपनी भूमि और संस्कृति के संरक्षण के लिए विधायी शक्तियां प्राप्त हो सकें। वर्तमान में लद्दाख एक केंद्र शासित प्रदेश है जहां प्रशासनिक निर्णय नौकरशाही द्वारा लिए जाते हैं, जिससे स्थानीय जनता खुद को कटा हुआ महसूस कर रही है। लेह और कारगिल के बीच इस मुद्दे पर बनी अभूतपूर्व एकता ने केंद्र सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। अब सभी की निगाहें केंद्र के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या लद्दाख को वह संवैधानिक कवच मिलेगा जिसकी वह मांग कर रहा है।

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