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Congress Flag History : विजयवाड़ा कांग्रेस सत्र की वो गुप्त बात, जिसके बाद देश को मिला पहला स्वराज झंडा!

Congress Flag History  : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ध्वज के इतिहास में 31 मई 1921 का दिन बेहद ऐतिहासिक है। आज ही के दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कांग्रेस के आधिकारिक झंडे को अपनी स्वीकृति दी थी। इस ध्वज का मूल प्रारूप आंध्र प्रदेश के युवा स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने तैयार किया था। शुरुआत में इस डिजाइन में केवल दो रंग शामिल थे—लाल और हरा, जो क्रमशः हिंदू और मुस्लिम समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे।

विजयवाड़ा सत्र और चरखे का आगमन

वर्ष 1921 में बेजवाड़ा (वर्तमान विजयवाड़ा) में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान पिंगली वेंकैया ने यह झंडा गांधीजी को सौंपा था। गांधीजी ने देश की विविधता को देखते हुए इसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि भारत के अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को दर्शाने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी जोड़ी जानी चाहिए। इसके साथ ही, देश की प्रगति, आत्मनिर्भरता और स्वदेशी आंदोलन को प्रदर्शित करने के लिए झंडे के केंद्र में एक चलता हुआ चरखा शामिल किया गया।

स्वाधीनता आंदोलन और कांग्रेस ध्वज की जड़ें

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा केवल एक राजनीतिक दल का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीयों के संघर्ष की कहानी बयां करता था। 1885 में जब कांग्रेस की स्थापना हुई, तब पार्टी का कोई आधिकारिक ध्वज नहीं था। शुरुआती दौर में प्रतीकों के बजाय राजनीतिक लामबंदी पर ध्यान दिया गया। पहली बार 1906 में एक हरा और गहरा लाल रंग का झंडा सामने आया, जिसके केंद्र में आठ प्रांतों को दर्शाने वाले आठ सफेद कमल बने हुए थे।

केसरिया, सफेद और हरे रंग का उदय

जैसे-जैसे आजादी की लड़ाई तेज हुई, झंडे के स्वरूप में बदलाव आता गया। 1921 के बाद इसमें तीन क्षैतिज पट्टियों को शामिल किया गया, जिसमें सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे हरी पट्टी रखी गई। झंडे के रंगों को नया अर्थ दिया गया, जहां केसरिया शौर्य और बलिदान का, सफेद शांति और सत्य का, और हरा रंग विश्वास व समृद्धि का प्रतीक बना। वर्ष 1931 में कांग्रेस ने औपचारिक रूप से इस चरखे वाले तिरंगे को अपने मुख्य प्रतीक के रूप में अपना लिया, जो देशव्यापी रैलियों की शान बन गया।

आजादी के बाद: तिरंगे से अशोक चक्र का सफर

15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिलने के बाद कांग्रेस के इस झंडे की भूमिका बदल गई। स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को तो स्वीकार किया गया, लेकिन इसके केंद्र से चरखे को हटाकर 24 तीलियों वाले ‘अशोक चक्र’ को स्थान दिया गया। सारनाथ के सिंह चतुर्मुख स्तंभ से लिया गया यह चक्र गतिशीलता और न्याय का प्रतीक है। हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने अपनी ऐतिहासिक विरासत को संजोए रखने के लिए अपने दलीय कार्यक्रमों में पुराने स्वरूप को जारी रखा।

दो बैलों की जोड़ी से ‘हाथ के पंजे’ तक का सफर

चुनाव राजनीति के दौर में कांग्रेस के प्रतीकों में भी बड़ा बदलाव आया। वर्ष 1950 में चुनाव आयोग ने कांग्रेस को ‘दो बैलों की जोड़ी’ का चुनाव चिह्न दिया था। 1969 में पार्टी के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को ‘गाय और बछड़ा’ चिह्न मिला। आखिरकार, आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में चुनाव आयोग ने कांग्रेस को ‘हाथ का पंजा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया, जो आज भी पार्टी की मुख्य पहचान बना हुआ है।

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