Wildlife Crisis: जलवायु परिवर्तन अब केवल थर्मामीटर पर बढ़ते पारे की कहानी नहीं रह गया है, बल्कि यह पृथ्वी के समस्त जैव विविधता तंत्र की जड़ों को हिला रहा है। ‘नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन’ जर्नल में प्रकाशित एक हालिया शोध ने दुनिया को हिला देने वाली चेतावनी दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ग्लोबल वॉर्मिंग की मौजूदा रफ्तार पर लगाम नहीं लगाई गई, तो साल 2085 तक जमीन पर रहने वाले एक-तिहाई से अधिक जानवरों के प्राकृतिक आवास (Habitats) भीषण जलवायु घटनाओं की चपेट में आ जाएंगे। अब खतरा केवल धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी का नहीं है, बल्कि उन चरम मौसमी घटनाओं का है जो पलक झपकते ही पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर सकती हैं।
जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च द्वारा किए गए इस विश्लेषण में ‘IUCN रेड लिस्ट’ और नवीनतम जलवायु पूर्वानुमानों का सहारा लिया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हीटवेव (लू), जंगल की आग, भीषण सूखा और अचानक आने वाली बाढ़ जैसे खतरे अब और अधिक घातक होने वाले हैं। प्रमुख शोधकर्ता स्टेफनी हाइनिके के अनुसार, वर्तमान संरक्षण योजनाओं में हम अक्सर धीरे-धीरे बढ़ते तापमान पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन अचानक आने वाली ‘चरम घटनाओं’ (Extreme Events) के सामूहिक प्रभाव को नजरअंदाज कर देते हैं। यही ‘कंपाउंड इफेक्ट’ वन्यजीवों के लिए सबसे बड़ा काल साबित होने वाला है।
अध्ययन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि जब एक से अधिक आपदाएं एक साथ या एक के बाद एक आती हैं, तो नुकसान का पैमाना कई गुना बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर, 2019-2020 में ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी भीषण आग से पहले वहां लंबे समय तक सूखा पड़ा था। सूखे ने वनस्पतियों को इतना कमजोर कर दिया था कि आग लगने पर जानवरों और पौधों की प्रजातियों में गिरावट की दर सामान्य से 27 से 40 प्रतिशत तक अधिक दर्ज की गई। यह स्पष्ट करता है कि जलवायु की मार झेल रही प्रजातियों के पास संभलने का समय ही नहीं बचता।
वैज्ञानिकों ने 33,936 स्थलीय कशेरुकी प्रजातियों (Terrestrial Vertebrates) और 794 पारिस्थितिक क्षेत्रों का गहराई से विश्लेषण किया। परिणाम बेहद डरावने हैं—मध्यम-उच्च उत्सर्जन की स्थिति में 2050 तक जानवरों के वर्तमान आवासों का औसतन 74% हिस्सा भीषण हीटवेव की गिरफ्त में होगा। इसके अलावा, 16% क्षेत्र जंगल की आग, 8% सूखे और 3% बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। 2085 तक स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी, जब लगभग 36% आवास ऐसे होंगे जहां एक साथ कई प्रकार की मौसमी आपदाएं कहर बरपाएंगी।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह संकट उन क्षेत्रों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा जो दुनिया के ‘बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट्स’ माने जाते हैं। अमेजन बेसिन के घने जंगल, अफ्रीका के वन्यजीव गलियारे और भारत समेत दक्षिण-पूर्व एशिया के पारिस्थितिकी तंत्र इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। यानी जहाँ प्रजातियों की विविधता सबसे अधिक है, वहीं खतरा भी सबसे भीषण है। हालांकि, शोध में उम्मीद की एक किरण भी दिखाई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि दुनिया एकजुट होकर ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य को समय पर हासिल कर ले, तो इन विनाशकारी भविष्यवाणियों को काफी हद तक बदला जा सकता है और लाखों प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है।
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