Allahabad High Court : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए नंदलाल राय को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिली है। अदालत ने उनकी दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगा दी है। राय आगामी विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जा रहे हैं। हालांकि, इस आदेश को दोषमुक्ति नहीं माना जा सकता। आपराधिक अपील पर अंतिम फैसला आने तक दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने का आदेश दिया गया है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने सुनाया फैसला
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने की। नंदलाल राय की ओर से दायर आपराधिक अपील पर विचार करते हुए अदालत ने यह आदेश जारी किया। राय को वाराणसी के सिगरा थाने में दर्ज वर्ष 2017 के हत्या मामले में सत्र न्यायालय ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और अपीलकर्ता की दलीलों पर विचार करने के बाद अपील लंबित रहने तक दोषसिद्धि तथा सजा पर रोक लगाना उचित माना।
आजीविका के अधिकार को अदालत ने बताया महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति के आजीविका कमाने के अधिकार को ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत के अनुसार, किसी आम व्यक्ति का जीवनयापन करने का अधिकार किसी राजनेता के चुनाव लड़ने के अधिकार से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसी आधार पर पीठ ने कहा कि अपील पर अंतिम निर्णय आने तक राय की दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाई जानी चाहिए, ताकि वह अपना जीवनयापन कर सकें। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि दोषी ठहराए जाने से पहले राय राजनीति में सक्रिय थे और भाजपा के कार्यकर्ता रहे थे।
अफजाल अंसारी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख
हाईकोर्ट ने पांच अक्टूबर को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2023 के अफजाल अंसारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले का भी हवाला दिया। उस मामले में शीर्ष अदालत ने जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारियों और मतदाताओं के प्रति उनके दायित्वों पर विचार किया था। फैसले में यह पहलू सामने आया था कि दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगने से किसी जनप्रतिनिधि के चुनाव लड़ने का अवसर समाप्त हो सकता है। नंदलाल राय के मामले में भी हाईकोर्ट ने संबंधित कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखा।
प्राथमिकी में नाम नहीं होने की दलील से शुरू हुई कानूनी लड़ाई
अपनी अपील में राय ने दलील दी कि हत्या के मामले में दर्ज प्राथमिकी में उनका नाम शामिल नहीं था। उनके अनुसार, प्राथमिकी दर्ज होने के 17 दिन बाद उनकी कथित संलिप्तता सामने लाई गई। सुनवाई के दौरान उनके वकील ने यह भी कहा कि मृतक प्रमोद कुमार निगम राजनीतिक रूप से सक्रिय थे और राय को संदेह तथा अटकलों के आधार पर मामले में फंसाया गया। अदालत ने इन दलीलों सहित मामले की परिस्थितियों पर विचार किया।
प्रमोद कुमार निगम हत्याकांड से जुड़ा है पूरा मामला
यह मामला राम जन्मभूमि आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता प्रमोद कुमार निगम की हत्या से संबंधित है। नंदलाल राय का संबंध गैंगस्टर से राजनेता बने मुख्तार अंसारी से बताया गया है। आरोप है कि मामूली विवाद के दौरान निगम की हत्या की गई थी। इस मामले में सत्र न्यायालय ने राय को दोषी ठहराया था। अब हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद उनकी आपराधिक अपील पर अंतिम निर्णय का इंतजार रहेगा। वर्ष 2027 के चुनाव में उनकी संभावित भागीदारी को लेकर भी राजनीतिक नजरें इस मामले पर बनी रहेंगी।
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