Asaduddin Owaisi on UCC : समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर देश में राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की UCC से संबंधित घोषणा पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधा है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि समान नागरिक संहिता लागू करने के नाम पर देश के गैर-हिंदू समुदायों पर हिंदू कानून थोपने की कोशिश की जा सकती है।

ओवैसी ने UCC के उद्देश्य पर उठाए सवाल
ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि भाजपा सरकार की ओर से नियुक्त विधि आयोग पहले ही UCC को आवश्यक और वांछनीय नहीं मान चुका है। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता में है और अलग-अलग समुदायों की अपनी परंपराएं तथा व्यक्तिगत कानून हैं। ओवैसी का दावा है कि UCC का उद्देश्य समानता स्थापित करना नहीं, बल्कि गैर-हिंदू समुदायों पर हिंदू कानून लागू करना हो सकता है।

संपत्ति कानूनों का भी किया जिक्र
AIMIM प्रमुख ने भाजपा शासित राज्यों में बनाए गए कुछ कानूनों का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि इन कानूनों का प्रभाव अलग-अलग समुदायों के बीच होने वाले संपत्ति संबंधी लेनदेन पर पड़ता है। ओवैसी ने इसे समान नागरिक संहिता की उस अवधारणा से जोड़ते हुए सवाल उठाया, जिसमें सभी नागरिकों के लिए समान नियम होने की बात कही जाती है।
‘लव जिहाद’ कानूनों पर भी निशाना
ओवैसी ने अपने बयान में तथाकथित ‘लव जिहाद’ कानूनों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राज्यों में लागू किए गए ऐसे कानूनों का इस्तेमाल मुस्लिम और ईसाई समुदायों को निशाना बनाने के लिए किया गया है। उनके मुताबिक, UCC को समानता के मुद्दे के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाने की राजनीति हो सकती है। हालांकि, ये ओवैसी के राजनीतिक आरोप हैं और केंद्र सरकार तथा भाजपा का इस मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण हो सकता है।
भाजपा सहयोगियों को दी स्वतंत्र रुख अपनाने की सलाह
AIMIM प्रमुख ने भाजपा के सहयोगी दलों को भी राजनीतिक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अब सहयोगी पार्टियों के सामने यह साबित करने का समय है कि उनकी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और आवाज है। ओवैसी ने सहयोगी दलों से केवल भाजपा के छोटे संस्करण के रूप में काम नहीं करने की अपील करते हुए अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने की बात कही।

CAA-NRC आंदोलन का किया उल्लेख
ओवैसी ने अपने बयान में नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और NRC के खिलाफ हुए आंदोलन का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2019 में तत्कालीन राजनीतिक बयानों और अमित शाह की ‘क्रोनोलॉजी’ वाली चर्चा के कारण देश के कई हिस्सों में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस समय के बयानों का भी उल्लेख किया, जिनमें NRC को लेकर स्पष्टीकरण दिया गया था।
SIR प्रक्रिया पर भी जताई चिंता
ओवैसी ने मौजूदा SIR प्रक्रिया को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने दावा किया कि आम लोगों को आवश्यक दस्तावेजों के साथ सुनवाई में उपस्थित होना पड़ रहा है। उनके अनुसार, इससे अल्पसंख्यक, SC-ST और प्रवासी समुदायों के सामने मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। उन्होंने आशंका जताई कि अगर भविष्य में NRC जैसी व्यापक प्रक्रिया लागू हुई तो नागरिकों पर अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज जुटाने का दबाव बढ़ सकता है।
असम NRC के अनुभव का दिया उदाहरण
ओवैसी ने असम में हुए NRC अनुभव का हवाला देते हुए नागरिकता संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर चिंता जताई। उन्होंने सवाल किया कि जिन करोड़ों लोगों का जीवन सरकारी योजनाओं और राशन जैसी सुविधाओं पर निर्भर है, उनसे पुराने दस्तावेज जुटाकर अपनी नागरिकता साबित करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में आम लोगों को सरकारी अधिकारियों के सामने दस्तावेजों के लिए निर्भर रहना पड़ सकता है। UCC, CAA-NRC और SIR को लेकर ओवैसी के ये बयान आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस को और तेज कर सकते हैं।
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