Parliament Special Session : संसद के विशेष सत्र की चर्चा तेज, महिला आरक्षण और परिसीमन पर सरकार की नजर

संसद के विशेष सत्र को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। महिला आरक्षण और लोकसभा परिसीमन जैसे अहम मुद्दों को लेकर सरकार की संभावित रणनीति पर निगाहें टिक गई हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विशेष सत्र के जरिए सरकार जरूरी राजनीतिक ‘नंबर गेम’ साधने की तैयारी कर रही है?

Parliament Special Session : संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए करीब एक महीना हो चुका है, लेकिन अभी तक संसद का औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ है। इसी बीच राजनीतिक गलियारों में संसद के संभावित विशेष सत्र को लेकर चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए विशेष सत्र बुलाने के विकल्प पर विचार कर रही है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

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नवरात्रि के आसपास विशेष सत्र की चर्चा

सूत्रों के अनुसार, विशेष सत्र को नवरात्रि के आसपास आयोजित किए जाने की संभावना पर विचार चल रहा है। हालांकि, सत्र कब शुरू होगा, कितने दिनों तक चलेगा और इसमें कौन-कौन से विधेयक या प्रस्ताव लाए जाएंगे, इसे लेकर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। ऐसे में फिलहाल विशेष सत्र की चर्चा राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर संभावनाओं तक ही सीमित है।

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131वें संविधान संशोधन पर नजर

महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को 131वें संविधान संशोधन के माध्यम से आगे बढ़ाने की चर्चा सामने आई है। यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो उसे संसद के भीतर पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जुटाना होगा। संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्तावों पर व्यापक सहमति बनाना सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी। विपक्षी दलों ने संभावित कदम को लेकर पहले ही सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

कांग्रेस ने सरकार पर लगाए आरोप

कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की ओर से सरकार की संभावित रणनीति पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार महत्वपूर्ण विषयों पर संसद की सामान्य प्रक्रिया को दरकिनार कर विशेष सत्र के जरिए विधेयक पेश करने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, सरकार की ओर से इस आरोप पर फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

संविधान संशोधन के लिए जरूरी है विशेष बहुमत

संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। इसके तहत उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन के साथ सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन भी जरूरी होता है। यही कारण है कि संभावित विशेष सत्र की स्थिति में सरकार के सामने सबसे अहम चुनौती पर्याप्त संख्या और राजनीतिक समर्थन जुटाने की होगी।

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वरिष्ठ नेताओं को बातचीत की जिम्मेदारी?

सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि सरकार ने विभिन्न राजनीतिक दलों से संवाद के लिए कुछ वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी देने पर विचार किया है। इनमें किरेन रिजिजू, पीयूष गोयल, अर्जुन राम मेघवाल और जेपी नड्डा जैसे नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। सहयोगी दल के नेता चिराग पासवान की संभावित भूमिका को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है। हालांकि, इन जिम्मेदारियों को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

परिसीमन पर दक्षिणी राज्यों की चिंता

परिसीमन का मुद्दा सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दलों को आशंका है कि आबादी के आधार पर होने वाले परिसीमन से लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व का मौजूदा संतुलन प्रभावित हो सकता है। डीएमके समेत कई दल परिसीमन को लेकर अपनी चिंताएं पहले ही सार्वजनिक कर चुके हैं। इसलिए सरकार के लिए दक्षिणी राज्यों के दलों को भरोसे में लेना अहम होगा।

महिला आरक्षण पर BJP का रुख

महिला आरक्षण का मुद्दा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा है। बीजेपी लंबे समय से महिला आरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराती रही है। हालांकि, संभावित विशेष सत्र या नए विधेयक को लेकर पार्टी की ओर से अभी कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है।

राजनीतिक बातचीत पर टिकी सरकार की रणनीति

फिलहाल संभावित विशेष सत्र को लेकर सरकार की रणनीति राजनीतिक दलों के साथ होने वाली बातचीत पर निर्भर दिखाई दे रही है। यदि सरकार विशेष सत्र बुलाने का फैसला करती है तो महिला आरक्षण और परिसीमन दोनों ही संसद के भीतर महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं। साथ ही, इन प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच सहमति और विरोध की तस्वीर भी राष्ट्रीय राजनीति पर व्यापक असर डाल सकती है।

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Chandan Das

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