Pawan Khera on SIR : मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में राजनीतिक विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अब अपनी ही बनाई प्रक्रिया में बदलाव करने को मजबूर हो रहा है। खेड़ा के मुताबिक, पहले जिस SIR प्रक्रिया को पूरी तरह सही और त्रुटिरहित बताया गया था, अब उसी में सुधार किए जा रहे हैं।
पवन खेड़ा ने CEC पर साधा निशाना
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त अब अपने ही बनाए जाल में फंस गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने के बाद अब चुनाव आयोग अपने पुराने फैसलों का बचाव करने में जुटा है।

खेड़ा ने सवाल किया कि यदि SIR से जुड़े सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे, तो अब उनमें बदलाव क्यों किए जा रहे हैं? उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि साथी चुनाव आयुक्तों ने कुछ बदलावों को अवैध बताते हुए आपत्ति जताई थी।

फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर करोड़ों मतदाताओं का मुद्दा उठाया
पवन खेड़ा ने सबसे बड़ा सवाल उन मतदाताओं को लेकर उठाया, जिनके नाम मसौदा SIR सूची से गायब हो गए हैं। उन्होंने पूछा कि यदि फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को अब वापस लिया जा रहा है, तो पहले प्रभावित हुए लोगों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
उन्होंने बिहार, पश्चिम बंगाल और असम का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि जिन लोगों को कथित तौर पर SIR की खामियों के कारण मतदान से वंचित होना पड़ा, उन्हें कौन जवाब देगा? क्या इन राज्यों के चुनावों की वैधता पर भी सवाल उठना चाहिए? खेड़ा ने पूछा कि क्या लाखों लोगों के मतदान अधिकार प्रभावित होने के बाद हुए चुनावों को पूरी तरह वैध माना जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग
कांग्रेस सांसद ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि नुकसान होने के बाद नियमों में बदलाव करके चुनाव आयोग अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता। खेड़ा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से पद छोड़ने की मांग भी की।
आखिर फॉर्म-6 को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
दरअसल, मसौदा SIR मतदाता सूची में जिन लोगों के नाम शामिल नहीं हैं, वे फॉर्म-6 के जरिए अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि, इस फॉर्म में एक घोषणा करनी होती है कि आवेदक पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा रहा है।
पहले से पंजीकृत मतदाताओं को डर था कि दोबारा फॉर्म-6 जमा करने पर उनकी घोषणा गलत मानी जा सकती है और उनके खिलाफ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई हो सकती है।
चुनाव आयोग ने फॉर्म-6 को लेकर दूर किया भ्रम
इस विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को स्पष्टीकरण जारी किया है। आयोग ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम मसौदा SIR सूची से हट गए हैं, वे अंतिम मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 जमा कर सकते हैं। ऐसा करने मात्र से इसे झूठी घोषणा नहीं माना जाएगा।
धारा 31 के तहत कब नहीं होगी कार्रवाई?
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर मतदाता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती कि वह पहले से पंजीकृत होने के बावजूद फॉर्म-6 जमा कर रहा है। कार्रवाई तभी संभव होगी, जब मतदाता किसी अन्य स्थान पर भी पंजीकृत हो या उसने जानबूझकर गलत अथवा गैरकानूनी घोषणा की हो।
आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में दिल्ली हाईकोर्ट के 14 अक्टूबर के फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि गलत घोषणा को लेकर मतदाताओं की आशंका निराधार है।
SIR विवाद में आगे क्या होगा?
फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण के बावजूद राजनीतिक विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस ने चुनाव आयोग की जवाबदेही और SIR प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है और प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों को लेकर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

