Supreme Court Electricity Dispute : भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) की जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े बिजली बकाये को लेकर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद आखिरकार समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मामले का निपटारा करते हुए तीनों राज्यों के बीच भुगतान की व्यवस्था पर मुहर लगा दी। अदालत ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है, जिसके तहत पंजाब और हरियाणा नकद भुगतान करने के बजाय हिमाचल प्रदेश को बिजली उपलब्ध कराएंगे।भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत के इस निर्णय से कई दशकों से लंबित बिजली हिस्सेदारी और बकाया भुगतान का मामला सुलझने का रास्ता साफ हो गया है।
हिमाचल प्रदेश को 20 साल में मिलेगी 11,973 मिलियन यूनिट बिजली
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों के भीतर हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट बिजली उपलब्ध कराएंगे। यह व्यवस्था वर्ष 2011 में शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए फैसले के अनुरूप होगी।दरअसल, 2011 के फैसले में हिमाचल प्रदेश के लिए भाखड़ा नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पादित बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी निर्धारित की गई थी। इसी आधार पर राज्य को वर्ष 1966 से मिलने वाले बिजली के बकाये का अधिकार दिया गया था। अब अदालत ने इसी पुराने अधिकार को ध्यान में रखते हुए बिजली के रूप में भुगतान करने की व्यवस्था को मंजूरी दी है।

पंजाब और हिमाचल के बीच भुगतान की समयसीमा पर था विवाद
इस समझौते को लेकर पहले पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच भुगतान की अवधि को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। केंद्र सरकार ने शुरुआत में प्रस्ताव दिया था कि बिजली का बकाया 15 वर्षों में चुकाया जाए। हालांकि, पंजाब सरकार ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए इसे 30 वर्षों में पूरा करने की मांग रखी थी।दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश चाहता था कि उसे मिलने वाली बिजली का पूरा बकाया 10 वर्षों के भीतर उपलब्ध कराया जाए। दोनों राज्यों की अलग-अलग मांगों के बीच मामला लंबे समय तक लंबित रहा। आखिरकार केंद्र सरकार के संशोधित प्रस्ताव के तहत 20 वर्षों की समयसीमा तय की गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

420 करोड़ रुपये का समायोजन, हिमाचल को नहीं देना होगा पैसा
इस समझौते में बांधों के निर्माण पर हुए ऐतिहासिक पूंजीगत खर्च को भी ध्यान में रखा गया है। इसके तहत 420 करोड़ रुपये का समायोजन किया जाएगा। इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हिमाचल प्रदेश को पंजाब और हरियाणा को अलग से कोई भुगतान नहीं करना होगा।इस तरह बिजली के बकाये और पुराने निर्माण खर्च से जुड़े वित्तीय मामलों का समाधान भी समझौते के माध्यम से किया गया है।
तीनों राज्यों की बिजली हिस्सेदारी का क्या है पूरा गणित?
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने हिमाचल प्रदेश के बिजली बकाये का मूल हिस्सा 13,066 मिलियन यूनिट निर्धारित किया था। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले में अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की बिजली हिस्सेदारी तय की गई थी।इसके अनुसार हिमाचल प्रदेश को 7.19 प्रतिशत, पंजाब को 51.80 प्रतिशत और हरियाणा को 37.51 प्रतिशत हिस्सेदारी दी गई थी। इसके अलावा चंडीगढ़ का हिस्सा 3.50 प्रतिशत निर्धारित किया गया था। राजस्थान की हिस्सेदारी में काफी हद तक कोई बदलाव नहीं किया गया था।

भाखड़ा, देहर और पोंग बांध से कब से मिलना था हिमाचल को हिस्सा?
सुप्रीम कोर्ट के 2011 के फैसले के अनुसार हिमाचल प्रदेश को अलग-अलग परियोजनाओं में अलग-अलग तारीखों से बिजली का हिस्सा मिलना था। भाखड़ा परियोजना के लिए यह अधिकार 1 नवंबर 1966 से, देहर परियोजना के लिए नवंबर 1977 से और पोंग बांध परियोजना के लिए जनवरी 1978 से प्रभावी माना गया था।अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से हिमाचल प्रदेश के लंबे समय से लंबित बिजली बकाये का भुगतान सुनिश्चित करने का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला तीनों राज्यों के बीच दशकों पुराने विवाद को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

