Mohan Bhagwat : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भुवनेश्वर स्थित संघ कार्यालय में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की आज़ादी केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है, जिसे बनाए रखने के लिए आने वाली पीढ़ियों को भी पूर्वजों जैसी कड़ी मेहनत करनी होगी। उन्होंने कहा, “हमारे पूर्वजों ने कई पीढ़ियों तक संघर्ष और बलिदान दिया, तब जाकर देश को स्वतंत्रता मिली। अब यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम इस स्वतंत्रता को कायम रखें और भारत को आत्मनिर्भर बनाते हुए ‘विश्व गुरु’ की भूमिका में लाएं।”

‘दुनिया को भारत से उम्मीद’
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि आज की दुनिया संघर्षों, युद्धों और पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है। ऐसे समय में भारत के पास न केवल समाधान देने की क्षमता है, बल्कि नैतिक नेतृत्व भी है। उन्होंने कहा, “दुनिया लड़खड़ा रही है। हमें सुख, शांति, सुरक्षा और सम्मान की दिशा में दुनिया को मार्गदर्शन देना है।” उनके अनुसार, यह नेतृत्व भारत के धर्म, ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। “भारत हमेशा दूसरों के साथ साझा करता है, लड़ता नहीं। यही हमारी पहचान है,” उन्होंने कहा।

‘विश्व गुरु’ बनने की राह
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत को अपने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के जरिए वैश्विक समस्याओं का समाधान देना चाहिए। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि अगर भारत को एक समृद्ध, शांतिपूर्ण और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना है, तो त्याग, अनुशासन और सेवा की भावना से काम करना होगा।
पीएम मोदी ने की संघ की सराहना
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लाल किले से अपने संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की सेवा यात्रा की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “RSS दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है, जिसने राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया है।”
पीएम मोदी ने कहा कि व्यक्ति निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण तक, संघ ने अनुशासन और समर्पण की मिसाल पेश की है, और यह संगठन आने वाले वर्षों में भी देश को प्रेरित करता रहेगा। मोहन भागवत और प्रधानमंत्री मोदी के वक्तव्यों से स्पष्ट है कि भारत की भूमिका अब केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखी जा रही है। ऐसे में भारतवासियों के लिए यह समय आत्ममंथन और संकल्प का है – कि हम सिर्फ स्वतंत्र नहीं रहें, बल्कि स्वतंत्रता के माध्यम से दुनिया को दिशा भी दें।












