One Nation One Election : ‘एक देश, एक चुनाव’ पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक मंगलवार को सम्पन्न हुई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने बिल की संवैधानिक वैधता और इसके प्रावधानों पर अपनी विशेषज्ञ राय साझा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह बिल संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन नहीं करता और न ही उसमें कोई परिवर्तन करता है।

चुनाव आयोग को दी गई शक्तियों पर खास जोर
जस्टिस खन्ना ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की भूमिका पर विशेष बल देते हुए कहा कि आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए जिम्मेदार संस्था है, जिसे जमीनी परिस्थितियों की सटीक जानकारी होती है। उन्होंने कहा कि राज्य विधानसभाओं के चुनाव स्थगित करने की शक्ति चुनाव आयोग को देना तार्किक है, मगर इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा प्रावधान जरूरी हैं।

खन्ना ने कहा- हर परिस्थिति में एक साथ चुनाव संभव नहीं
पूर्व न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बिल का घोषित उद्देश्य चुनावों की आवृत्ति को कम करना है, लेकिन यह हर स्थिति में व्यवहारिक नहीं हो सकता। विशेषकर तब जब किसी राज्य विधानसभा को समय से पहले भंग कर दिया जाए। उन्होंने इस स्थिति में लचीलापन और संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता बताई। जस्टिस खन्ना ने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और राजनीतिक वर्ग की जिम्मेदारी पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश में लंबे समय से कोई मध्यावधि चुनाव नहीं हुआ है। यह बात देश की राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत मजबूती का प्रमाण है। जस्टिस खन्ना ने सुझाव दिया कि राष्ट्रपति द्वारा चुनाव तिथि अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया को बदलकर, कानून में एक निश्चित तारीख पहले से तय कर देनी चाहिए। इससे चुनावों की तैयारी और निष्पक्षता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
क्या है ‘एक देश, एक चुनाव’ का प्रस्ताव?
यह विधेयक लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव करता है। इसका उद्देश्य चुनावों की आवृत्ति को कम कर प्रशासनिक खर्च, समय और संसाधनों की बचत करना है। इससे बार-बार की चुनावी प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाले आर्थिक और लॉजिस्टिक दबाव से राहत मिलने की संभावना है। भारत में 1951, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए थे। लेकिन 1960 के दशक में कुछ विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण यह प्रक्रिया टूट गई। तब से लोकसभा और राज्यों के चुनाव अलग-अलग समय पर कराए जा रहे हैं।
राजनीतिक समर्थन और विरोध में बंटे दल
भाजपा, जेडीयू, बीजेडी और कुछ अन्य क्षेत्रीय दल ‘एक देश, एक चुनाव’ के समर्थन में हैं। भाजपा ने इसे 2014 और 2019 के अपने चुनावी घोषणापत्र में भी शामिल किया था। वहीं, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआईएम और एआईएमआईएम जैसे विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने इस पर फिलहाल तटस्थ रुख अपनाया है। एक देश, एक चुनाव की व्यवहारिकता का अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट 2024 के अंत में केंद्र को सौंप दी। इसके बाद दिसंबर 2024 में ‘129वां संविधान संशोधन विधेयक’ और ‘संघ एवं समवर्ती चुनाव विधेयक 2024’ लोकसभा में पेश किए गए। दोनों विधेयकों को भाजपा सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में बनी संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया है।
अब अगली रणनीति पर टिकी है निगाहें
बैठक के समापन के बाद अब समिति की रिपोर्ट और सिफारिशों का इंतजार है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही विधेयकों की आगे की संसदीय प्रक्रिया और ‘एक देश, एक चुनाव’ की व्यवहारिकता तय होगी।
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