Supreme Court ने बुधवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें राज्यपाल की मर्जी पर नहीं चल सकतीं और अगर विधानसभा किसी बिल को दोबारा पास करती है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने यह निर्देश दिया।

राज्यपाल के पास चार विकल्प
संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं – बिल को मंजूरी देना, बिल की मंजूरी रोकना, राष्ट्रपति के पास भेजना या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि विधानसभा वही बिल दोबारा पास करके राज्यपाल को भेजती है, तो राज्यपाल को बिल को मंजूरी देनी होगी।

राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर
बेंच में चीफ जस्टिस बीआर गवई के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंदुरकर शामिल थे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल के पास यह अधिकार नहीं है कि वे अनिश्चितकाल तक किसी बिल की मंजूरी रोककर रखें, क्योंकि इससे निर्वाचित सरकारें राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर हो जाएंगी।
केंद्र का दलिल
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि राज्यपाल केवल पोस्टमैन की भूमिका में नहीं हो सकते, बल्कि उनके पास संवैधानिक अधिकार हैं और उन्हें राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। हालांकि वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने केंद्र की दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि राज्यपाल को यह अधिकार है, तो फिर राष्ट्रपति भी केंद्र सरकार के बिलों की मंजूरी रोक सकते हैं। चीफ जस्टिस ने इस पर कहा कि संविधान की व्याख्या राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार नहीं की जाएगी। जस्टिस पीएस नरसिंहा ने कहा कि राज्यपाल की शक्तियों की व्याख्या सीमित नहीं हो सकती। संविधान एक जीवंत दस्तावेज है और इसकी व्याख्या समय और परिस्थितियों के अनुसार होनी चाहिए।
जस्टिस नरसिंहा ने यह भी बताया कि राज्यपाल बिल को संशोधन के लिए वापस लौटा सकते हैं। यदि विधानसभा संशोधन कर देती है, तो उसके बाद राज्यपाल बिल को मंजूरी दे सकते हैं। इस फैसले से राज्यपाल और विधानसभा के बीच संतुलन स्थापित होगा और निर्वाचित सरकारों के कामकाज पर अनावश्यक हस्तक्षेप रोका जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में गुरुवार को लगातार तीसरे दिन सुनवाई जारी रखेगी। यह मामला “भारत के राज्यपाल और राष्ट्रपति की तरफ से बिल को मंजूरी, रोक या रिजर्वेशन” से जुड़ा है और इसका असर भविष्य में राज्यों और केंद्र सरकार के बीच संवैधानिक अधिकारों की सीमा पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

यह निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करेगा और सुनिश्चित करेगा कि निर्वाचित सरकारों को उनके संवैधानिक अधिकारों के अनुसार काम करने दिया जाए।
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