Mor Singh school : जुलाई महीने में जब पीपलोदी गांव में स्कूल भवन गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत हुई और 21 घायल हो गए, तब पूरे इलाके में शोक और आक्रोश का माहौल था। हादसे के बाद सबसे बड़ी चिंता यह थी कि बाकी बच्चों की पढ़ाई कैसे और कहां जारी रखी जाए। ऐसे कठिन समय में गांव के एक किसान मोर सिंह ने जो फैसला लिया, उसने सभी को हैरान और भावुक कर दिया।

मोर सिंह ने खोला अपना घर, खुद खेत में रहने लगे
जब स्कूल की इमारत गिरने के बाद वैकल्पिक स्थान की तलाश की जा रही थी, तब कोई भी व्यक्ति स्कूल के लिए अपना घर देने को तैयार नहीं था। उसी वक्त मोर सिंह आगे आए और बिना किसी शर्त के अपना दो कमरों का घर स्कूल को दे दिया। इतना ही नहीं, वे खुद अपने आठ सदस्यीय परिवार के साथ खेत में तिरपाल की झोपड़ी में रहने लगे। मोर सिंह कहते हैं “अगर मेरे घर में बच्चे पढ़ाई कर सकते हैं तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा। बारिश हो या गर्मी, हम खेत में रह लेंगे, लेकिन बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।”

2011 में बनाया था घर, अब बना बच्चों की शिक्षा का मंदिर
मोर सिंह ने साल 2011 में दिहाड़ी मजदूरी करके चार लाख रुपये से यह घर बनवाया था। लेकिन आज वही घर गांव के 75 बच्चों की पढ़ाई का केंद्र बन गया है। झोपड़ी में रहने के बावजूद मोर सिंह और उनके परिवार में कोई शिकवा नहीं है। वे खुद को गर्वित महसूस करते हैं कि उनका घर शिक्षा के लिए उपयोग हो रहा है।
प्रशासन और गांव वालों से मिला सम्मान
झालावाड़ के कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ ने मोर सिंह को ‘भामाशाह’ की उपाधि दी और सरकार की ओर से दो लाख रुपये की सहायता राशि भी प्रदान की गई। प्रशासन ने यह भी बताया कि यदि मोर सिंह ने मदद नहीं की होती, तो बच्चों को 2–3 किलोमीटर दूर स्कूल भेजना पड़ता।
नया स्कूल भवन निर्माणाधीन, गांव बनेगा मॉडल
राज्य सरकार ने पीपलोदी गांव के लिए 1.8 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी है और 10 बीघा जमीन पर नया स्कूल भवन बनने का कार्य शुरू हो चुका है। साथ ही सरकार ने पीपलोदी को ‘मॉडल विलेज’ बनाने का ऐलान किया है। इसके तहत नारा दिया गया है:”हमारा संकल्प–पीपलोदी का कायाकल्प, हादसे से विकास तक।”
बढ़ा विश्वास, 10 नए बच्चों का दाखिला
हादसे के बाद माता-पिता डरे हुए थे, लेकिन जब मोर सिंह ने खुद आगे आकर घर दिया, तो गांव वालों का भरोसा लौट आया। नतीजन 10 नए बच्चों का एडमिशन भी हुआ और अब कुल 75 बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं। मोर सिंह भले ही औपचारिक शिक्षा से दूर रहे हों, लेकिन उन्होंने शिक्षा का जो महत्व समझा और जो त्याग किया, वह पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। उनका यह कदम बताता है कि सच्ची सेवा और मानवता सिर्फ शब्दों से नहीं, कर्म से होती है।
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