London Protest Arrest: ब्रिटेन की राजधानी लंदन में शनिवार को एक बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान 425 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। यह प्रदर्शन ‘डिफेंड अवर जूरीज’ (Defend Our Juries) नामक समूह द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें लगभग 1,500 लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारी ब्रिटेन सरकार से फिलिस्तीन एक्शन (Palestine Action) समूह पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग कर रहे थे।

गौरतलब है कि जुलाई 2025 में फिलिस्तीन एक्शन पर आतंकवाद कानून 2000 के तहत प्रतिबंध लगाया गया था। इस प्रतिबंध के अनुसार, इस संगठन का समर्थन या सदस्यता अपराध माना जाता है, जिसकी अधिकतम सजा 14 साल तक की जेल हो सकती है। यह फैसला सरकार द्वारा संगठन की गतिविधियों को “उग्र और विध्वंसक” करार देने के बाद लिया गया था।

पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव
लंदन की मेट्रोपॉलिटन पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने संसद के बाहर पुलिसकर्मियों पर हमला किया और प्रतिबंधित संगठन का समर्थन करते हुए नारे लगाए। इसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां कीं।
हालांकि, ‘डिफेंड अवर जूरीज’ समूह का दावा है कि पुलिस की कार्रवाई अत्यधिक हिंसक और दमनकारी थी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो साझा किया जिसमें पुलिस प्रदर्शनकारियों को जमीन पर पटकती हुई दिखाई दे रही है। समूह ने कहा कि कई लोगों को केवल नारे लगाने जैसे – “मैं नरसंहार का विरोध करता हूं” और “मैं पालेस्टाइन एक्शन का समर्थन करता हूं” – के लिए गिरफ्तार किया गया।
नागरिक स्वतंत्रता पर सवाल
फिलिस्तीन एक्शन समूह की सह-संस्थापक हुदा अम्मोरी ने सरकार के फैसले की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि यह प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए खतरा है। उन्होंने इसे लोकतंत्र विरोधी कदम बताया और कहा कि इससे विरोध की आवाज को दबाया जा रहा है।
फिलहाल, समूह ने सरकार के इस प्रतिबंध को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले की सुनवाई 25 सितंबर 2025 को निर्धारित है, जिसे लेकर समर्थकों और मानवाधिकार संगठनों की नजरें टिकी हुई हैं। यह घटना ब्रिटेन में नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक विरोध की सीमाओं को लेकर एक नई बहस को जन्म दे रही है। जहां सरकार इसे कानून व्यवस्था का मामला मान रही है, वहीं प्रदर्शनकारी इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बता रहे हैं। आगामी कोर्ट की सुनवाई इस पूरे विवाद में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है।










