Supreme Court Bail Order: देश की अदालतों में वर्षों से लंबित जमानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट और अधीनस्थ न्यायालयों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि जमानत या अंतरिम जमानत से जुड़ी याचिकाओं का निपटारा अधिकतम दो महीने के भीतर किया जाए।

यह निर्देश जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने एक विशेष सुनवाई के दौरान दिया। पीठ ने कहा, “व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी याचिकाएं वर्षों तक लंबित नहीं रह सकतीं। इससे न केवल आरोपी के अधिकारों का हनन होता है, बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगता है।”

क्यों जरूरी था यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट बॉम्बे हाई कोर्ट में लंबित एक जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका 2019 में दायर की गई थी, लेकिन इसे 2025 तक टालते-टालते खारिज कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी को “न्याय में देरी = न्याय से इनकार” की परिभाषा में रखा और बॉम्बे हाई कोर्ट को फटकार भी लगाई।
न्यायालय ने दो टूक कहा कि यदि आरोपी की ओर से कोई जानबूझकर देरी न हो, तो अदालतों को किसी भी सूरत में 60 दिनों के भीतर जमानत याचिका पर निर्णय देना होगा।
मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन तब होता है जब बिना दोष सिद्ध हुए व्यक्ति सालों तक जेल में बंद रहता है।
अक्सर छोटे-मोटे अपराधों में आरोपी गिरफ्तार किए जाते हैं और लंबे समय तक मुकदमे की प्रक्रिया चलती रहती है। कई बार वे निर्दोष साबित होते हैं, लेकिन तब तक उनका जीवन जेल में ही कट चुका होता है। यह स्थिति न्याय व्यवस्था की धीमी गति और संरचनात्मक खामियों को उजागर करती है।
क्या होगा असर?
इस फैसले के बाद देश भर की अदालतों पर दबाव बढ़ेगा कि वे जमानत याचिकाओं को प्राथमिकता से लें। इससे जेलों में भीड़ कम होगी और निर्दोष लोगों को लंबे समय तक कैद में रहने से राहत मिल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित न्याय के अधिकार को मजबूती देगा। अदालतों को अब जमानत मामलों में देरी करने पर जवाबदेह ठहराया जाएगा, जिससे न्यायिक प्रणाली में आम जनता का विश्वास बढ़ेगा।










