Gen-Z movement: नेपाल की नई अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की अध्यक्षता में हुई पहली कैबिनेट बैठक में जेन-Z आंदोलन के दौरान मारे गए 72 लोगों को “शहीद” घोषित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। सरकार ने 17 सितंबर (१ अशोज) को राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया है। यह कदम जनभावनाओं को सम्मान देते हुए लिया गया है।

परिवारों को मुआवजा और सहायता राशि
कैबिनेट ने निर्णय लिया कि प्रत्येक शहीद के परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। इसके अलावा, अंतिम संस्कार, चिकित्सा और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए 5 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता राशि भी दी जाएगी।

निष्पक्ष जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित
सरकार ने आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए एक उच्च स्तरीय न्यायिक जांच आयोग के गठन का भी सैद्धांतिक निर्णय लिया है। आयोग आंदोलन के दौरान हुई हिंसा, पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की मौत की विस्तृत जांच करेगा।
जेन-Z मेमोरियल पार्क का निर्माण
शहीदों की स्मृति को जीवित रखने और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने के उद्देश्य से सरकार ने “जेनजी मेमोरियल पार्क” के निर्माण का फैसला किया है। यह पार्क आंदोलन की ऐतिहासिकता और बलिदान की भावना का प्रतीक बनेगा।
ओली सरकार के सभी प्रस्ताव रद्द
सुशीला कार्की सरकार ने पूर्ववर्ती केपी शर्मा ओली मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्तुत सभी कैबिनेट प्रस्तावों को रद्द कर दिया है। इस कदम को पुरानी नीतियों से दूरी बनाते हुए नई पारदर्शी और लोकतांत्रिक दिशा में आगे बढ़ने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नए मंत्रियों की नियुक्ति
प्रधानमंत्री कार्की ने अपने मंत्रिमंडल में तीन नए चेहरों को शामिल किया:
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कुलमन घीसिंग – ऊर्जा, जल संसाधन एवं शहरी विकास मंत्री
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रामेश्वर खनाल – वित्त मंत्री
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ओम प्रकाश आर्यल – कानून एवं गृह मंत्रालय का प्रभार
इन मंत्रियों को सोमवार, 15 सितंबर को राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की उपस्थिति में शपथ दिलाई गई। कार्की ने एक दिन पहले, 14 सितंबर को कार्यभार संभाला था।
आंदोलन की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि यह व्यापक जन आंदोलन उस समय भड़का जब 9 सितंबर को केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग करते हुए सैकड़ों प्रदर्शनकारी उनके कार्यालय में घुस गए। बढ़ते दबाव के बीच ओली को इस्तीफा देना पड़ा। पूरे देश में फैले विरोध प्रदर्शनों में 72 लोगों की जान चली गई थी।सुशीला कार्की सरकार का यह निर्णय नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है। यह न केवल जन आंदोलन के शहीदों को सम्मान देने की दिशा में एक कदम है, बल्कि सरकार की संवेदनशीलता और जवाबदेही का भी प्रमाण है।










