RSS verdict: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ दर्ज आपराधिक शिकायत को बेंगलुरु की अदालत ने खारिज कर दिया है। यह शिकायत उनके उस बयान को लेकर की गई थी, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बजरंग दल को “अपराध करने वाले संगठन” बताया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि RSS कोई धार्मिक संगठन नहीं है और मुख्यमंत्री का बयान संविधान द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकारों के तहत सुरक्षित है।

अदालत का तर्क: धर्म से नहीं जुड़ा RSS
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) के.एन. शिवकुमार ने अपने आदेश में कहा कि RSS को उसकी आधिकारिक वेबसाइट पर भी धार्मिक संगठन के रूप में नहीं दर्शाया गया है। ऐसे में मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान किसी धर्म विशेष या धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाला नहीं माना जा सकता।

विधानसभा की कार्यवाही का हिस्सा
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री का बयान 17 मार्च को विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 194(2) के अनुसार, विधानसभा के भीतर दिए गए बयानों पर विधायकों को विशेष संरक्षण प्राप्त है। अतः यह बयान उस विशेषाधिकार के अंतर्गत आता है और उस पर कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।
शिकायतकर्ता के दावे पर भी उठे सवाल
शिकायत अधिवक्ता किरण एन द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मानहानि और धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगाए गए थे। हालांकि कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता ने यह साबित नहीं किया कि वह RSS की ओर से अधिकृत व्यक्ति हैं। इस आधार पर भी शिकायत कमजोर मानी गई।
क्या था सिद्धारमैया का बयान?
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विधानसभा में विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा था, “अपराध नहीं होने चाहिए, लेकिन कई अपराध RSS और बजरंग दल के लोग ही करते हैं। ये संगठन अपराधी बनाते हैं।” इस बयान के बाद विपक्षी दलों और संबंधित संगठनों ने तीव्र विरोध जताया था और कानूनी कार्यवाही की मांग की थी।
राजनीतिक और सामाजिक असर
अदालत के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक संरक्षण की जीत बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे न्यायपालिका का “राजनीतिक दुरुपयोग” कह रहे हैं।
बेंगलुरु कोर्ट का यह फैसला न केवल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को राहत देता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर दिए गए बयान किस प्रकार संवैधानिक दायरे में सुरक्षित होते हैं। साथ ही यह निर्णय राजनीतिक विमर्श की मर्यादाओं और कानूनी सीमाओं को लेकर भी एक अहम नज़ीर बन सकता है।










