Shardiya Navratri 2025: शारदीय नवरात्रि हिन्दू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है। इस दिन घटस्थापना (कलश स्थापना) का विशेष महत्व होता है, जिसे मां दुर्गा के आगमन और पूजा की शुरुआत माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में घटस्थापना की तिथि एक जैसी क्यों नहीं होती? कहीं प्रतिपदा, कहीं पंचमी, तो कहीं सप्तमी को मूर्ति स्थापना की परंपरा क्यों निभाई जाती है?

इस लेख में हम समझेंगे कि नवरात्रि के दौरान मूर्ति स्थापना की तारीखें क्षेत्रीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार क्यों बदलती हैं।

उत्तर भारत: प्रतिपदा से घटस्थापना
उत्तर भारत में नवरात्रि का स्वरूप अधिकतर साधना और उपासना से जुड़ा होता है। यहां प्रतिपदा (पहले दिन) से ही मां दुर्गा की प्रतिमा और घट की स्थापना कर दी जाती है। घरों और मंदिरों में अखंड ज्योति जलाई जाती है, और मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं, जिन्हें नवरात्रि की शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती का पाठ और भजन-कीर्तन होते हैं।
अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, जहां छोटी बच्चियों को देवी का रूप मानकर पूजन और भोग अर्पित किया जाता है।
गुजरात और पश्चिम भारत: पंचमी या षष्ठी को मूर्ति स्थापना
गुजरात में नवरात्रि केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है। यहां मां की मूर्ति को आमतौर पर पंचमी या षष्ठी तिथि को स्थापित किया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि गरबा और डांडिया महोत्सव के मुख्य दिनों में श्रद्धालु पूरी भक्ति और उत्साह से भाग ले सकें।
पूरे राज्य में पंडाल, सजावट, लोकनृत्य और भक्ति गीतों का वातावरण रहता है, जो नवरात्रि को एक जन-आंदोलन जैसा बना देता है।
बंगाल और पूर्वोत्तर भारत: सप्तमी से मूर्ति प्रतिष्ठा
बंगाल में नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में भव्य रूप से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि षष्ठी तिथि को मां दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन होता है, और सप्तमी के दिन देवी की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। इस दिन ‘चक्षुदान’ की रस्म होती है, जिसमें मां की मूर्ति को दिव्य दृष्टि दी जाती है।
सप्तमी से दशमी तक का समय पूरे समाज को भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक गतिविधियों में लीन कर देता है।
दक्षिण भारत: नवरात्रि में बोम्मई कोलू
दक्षिण भारत में नवरात्रि को गोलू या बोम्मई कोलू कहा जाता है। यहां नवरात्रि के पहले दिन से ही देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों की छोटी मूर्तियों को सीढ़ीदार तरीके से सजाया जाता है। हर दिन अलग-अलग देवी स्वरूपों की पूजा होती है। साथ ही, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
यह परंपरा बच्चों को धार्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक मूल्यों से जोड़ने का माध्यम भी बनती है।
नवरात्रि में घटस्थापना की तिथि और मूर्ति स्थापना की परंपराएं भारत की विविधता में एकता को दर्शाती हैं। चाहे प्रतिपदा हो, पंचमी हो या सप्तमी—मूल उद्देश्य मां दुर्गा का स्वागत, उनकी पूजा-अर्चना और भक्ति का प्रसार है। यही कारण है कि अलग-अलग प्रांतों की परंपराएं भले ही भिन्न हों, लेकिन श्रद्धा और आस्था की डोर सबको एक साथ बांधती है।











