Assam Tribal Protest: असम इस समय एक दोहरी चुनौती से गुजर रहा है। जहां राज्य अपने लोकप्रिय गायक जुबीन गर्ग की मौत का शोक मना रहा है, वहीं दूसरी ओर मटक समुदाय समेत छह प्रमुख आदिवासी जनजातियों का आंदोलन राज्य सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। ये सभी समुदाय अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर सड़कों पर हैं।

कौन-कौन से समुदाय हैं आंदोलन में शामिल?
मटक के साथ-साथ ताई अहोम, मोरान, चाय जनजाति, चुटिया और कोच राजबोंगशी समुदाय भी इस आंदोलन का हिस्सा हैं। ये सभी मिलकर असम की कुल आबादी का लगभग 12.4% हिस्सा हैं। इन समुदायों को ST दर्जा मिलने के बाद यह संख्या बढ़कर 40% तक पहुंच सकती है, जिससे राज्य की सामाजिक और राजनीतिक संरचना में बड़ा बदलाव संभव है।

मटक आंदोलन की अगुवाई युवा कर रहे
ऑल असम मटक स्टूडेंट्स यूनियन के नेतृत्व में बीते 10 दिनों में डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया में भारी संख्या में आदिवासी सड़कों पर उतरे हैं। मशाल जुलूस, बड़ी रैलियों और विरोध प्रदर्शनों के जरिए उन्होंने सरकार को चेताया है कि अब केवल आश्वासन नहीं, लिखित गारंटी चाहिए। यूनियन के अध्यक्ष संजय हजारिका ने साफ कहा, “हम मूल रूप से जनजाति हैं, लेकिन आज तक हमें अधिकार नहीं मिले।”
राज्य सरकार पर दबाव, बातचीत से इनकार
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने 25 सितंबर को मटक नेताओं को वार्ता के लिए बुलाया, लेकिन आंदोलनकारियों ने मिलने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि अब केवल लिखित समाधान ही मंजूर होगा, वादों से भरोसा टूट चुका है।
मोरान समुदाय का अल्टीमेटम
मटक से पहले मोरान समुदाय भी डिब्रूगढ़ में रैली निकाल चुका है। “नो ST, नो रेस्ट” नारे के साथ हुए इस प्रदर्शन के बाद मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई और 25 नवंबर तक का समय मांगा गया। मोरान यूनियन के महासचिव जोयकांता मोरान ने चेतावनी दी है कि अगर डेडलाइन तक समाधान नहीं हुआ तो राज्य में आर्थिक नाकेबंदी की जाएगी।
राजनीतिक समीकरण और चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन छह समुदायों को ST दर्जा मिल जाता है, तो असम की कुल ST आबादी 50% के करीब पहुंच जाएगी। ऐसे में असम को छठी अनुसूची में शामिल करना पड़ सकता है, जैसा कि नगालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा में है। इससे राज्य के गैर-आदिवासी समुदायों में असंतोष की आशंका बढ़ रही है। असम में आदिवासी आंदोलन अब केवल सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं रह गया है, यह राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा को बदलने वाला मोड़ बन चुका है। अगर सरकार समय रहते समाधान नहीं निकालती, तो यह आंदोलन न सिर्फ चुनावी समीकरण बदल सकता है, बल्कि राज्य की आंतरिक स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है।











