Gitanjali Wangchuk letter: लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और नवाचारकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर देशभर में बहस तेज हो गई है। उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक भावुक पत्र लिखते हुए पति की बिना शर्त रिहाई की मांग की है। गीतांजलि ने इस पत्र की प्रतिलिपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी भेजी है।

राष्ट्रपति मुर्मू को भावनात्मक अपील
पत्र में गीतांजलि ने राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए कहा, “एक आदिवासी होने के नाते आप लद्दाख के लोगों की भावनाओं और उनकी संस्कृति को बेहतर समझ सकती हैं।” उन्होंने लिखा कि 24 सितंबर को लद्दाख में हुई हिंसा में सोनम का कोई हाथ नहीं था, बल्कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से हिंसा की निंदा की थी।

NSA के तहत गिरफ्तारी को बताया “अनुचित”
गीतांजलि ने वांगचुक पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तारी को पूरी तरह अनुचित बताया। उनका कहना है कि वांगचुक देश के लिए समर्पित एक ऐसे व्यक्ति हैं जो किसी के लिए खतरा नहीं बन सकते, “न ही समाज के लिए और न ही राष्ट्र के लिए।”
सेना और राष्ट्र के लिए योगदान का उल्लेख
पत्र में गीतांजलि ने वांगचुक के कार्यों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय सेना के जवानों के लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में शेल्टर होम्स बनाए ताकि वे बेहतर आराम कर सकें और प्रभावी ढंग से सीमा की रक्षा कर सकें। उन्होंने कहा, “लद्दाख के एक सपूत के साथ ऐसा बर्ताव न केवल अन्याय है, बल्कि सीमा क्षेत्र में एकजुटता और शांति की भावना को भी कमजोर करता है।”
व्यक्तिगत पीड़ा और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन
गीतांजलि ने दावा किया कि उन्हें अब तक अपने पति से बात करने की अनुमति नहीं दी गई है और उनकी वर्तमान हालत की भी कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया था कि अधिकारी मुझे मेरे कानूनी अधिकार समझाएंगे, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ।”
आरोपों को बताया “झूठा और राजनीतिक”
गीतांजलि ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले चार वर्षों से लद्दाख में चल रहे जन आंदोलन को दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने वांगचुक के NGO का FCRA लाइसेंस रद्द करने और कथित पाकिस्तानी लिंक जैसे आरोपों को झूठा, बेबुनियाद और राजनीतिक प्रेरित बताया।
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ हुई कार्रवाई पर देशभर में चिंता जताई जा रही है। उनकी पत्नी द्वारा राष्ट्रपति को लिखा गया यह पत्र न केवल व्यक्तिगत पीड़ा को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जनभावनाओं और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी कितनी खतरनाक हो सकती है।










