Ambikapur News : सरगुजा जिले के अंबिकापुर मुख्यालय में सिस्टम की लापरवाही एक विशेष संरक्षित जनजाति के युवक की जान पर भारी पड़ गई। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल पहाड़ी कोरवा युवक गुड्डू कोरवा (34) को समय पर एम्बुलेंस न मिलने के कारण रायपुर ले जाते समय रास्ते में ही मौत हो गई। परिजनों और कांग्रेस नेताओं ने अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में शव रखकर प्रदर्शन किया और मुआवजे की मांग की।

26 घंटे तक नहीं मिली एम्बुलेंस
बलरामपुर जिले के राजपुर ब्लॉक के ग्राम मदेश्वरपुर निवासी गुड्डू कोरवा शनिवार को घटगांव से लौटते समय बाइक हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्हें सिर में गंभीर चोटें आईं। अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में भर्ती कर ICU में वेंटिलेटर पर रखा गया। रविवार दोपहर 3 बजे डॉक्टरों ने उन्हें रायपुर न्यूरो सर्जरी के लिए रेफर किया, लेकिन तत्काल वेंटिलेटर एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी।

परिजनों ने बताया कि उन्होंने 108 संजीवनी सेवा, डॉक्टरों और अफसरों से लगातार संपर्क किया, लेकिन हर बार उन्हें प्रोटोकॉल में व्यस्त होने की बात कहकर टाल दिया गया। जिला प्रशासन ने राज्यपाल रमेन डेका के दौरे का हवाला देकर एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं कराई।
इलाज में देरी, मौत ने तोड़ा दम
आखिरकार घायल युवक को सोमवार शाम रायपुर रवाना किया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रायपुर पहुंचने से पहले ही रास्ते में गुड्डू कोरवा की मौत हो गई। रायपुर अस्पताल में डॉक्टरों ने मृत घोषित किया और शव वाहन देने से भी इनकार कर दिया।
शव वाहन भी नहीं मिला, निजी वाहन से शव लाए
मृतक के परिजन 9 हजार रुपये में निजी वाहन किराए पर लेकर शव को अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज लाए। यहां कांग्रेस जिलाध्यक्ष बालकृष्ण पाठक और युकां नेता बृजेश मिश्रा के साथ मिलकर शव को जमीन पर रखकर करीब दो घंटे तक प्रदर्शन किया गया। परिजनों ने कहा कि मंत्री, सांसद और विधायक सभी से मदद मांगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया।
कांग्रेस ने की FIR और मुआवजे की मांग
सरगुजा कांग्रेस जिलाध्यक्ष बालकृष्ण पाठक ने प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि यह मामला गैर इरादतन हत्या का है। उन्होंने दोषियों पर FIR दर्ज कर मुआवजे की मांग की। साथ ही बताया कि शव लाने का खर्च भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उठाया। मृतक के भाई बजरू कोरवा ने कहा कि वे 26 घंटे तक मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन समय पर वेंटिलेटर एम्बुलेंस नहीं मिली। “गरीब आदिवासी होने के कारण शायद हमारी आवाज नहीं सुनी गई,” उन्होंने दुख भरे स्वर में कहा।
इस घटना ने सरकारी सिस्टम और स्वास्थ्य सुविधाओं की वास्तविकता को उजागर कर दिया है। एक विशेष संरक्षित जनजाति के युवक की मौत केवल इलाज में देरी से हुई, जो सवाल खड़े करती है क्या आदिवासी समुदाय की जान की कोई कीमत नहीं?











