Karwa Chauth 2025: करवा चौथ भारतीय संस्कृति में सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत पति की लंबी आयु, स्वस्थ्य और सौभाग्य के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि करवा चौथ की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानते हैं इस पावन पर्व के पीछे छिपी पौराणिक कथाओं और इतिहास के बारे में।

करवा चौथ की शुरुआत: देवताओं और दानवों के युद्ध की कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध हुआ था। दानवों की संख्या और शक्ति इतनी बढ़ गई कि देवताओं की हार होने लगी। संकट में पड़े देवता ब्रह्मदेव के पास मदद के लिए पहुंचे। ब्रह्मदेव ने देवताओं की पत्नियों को कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कठोर उपवास रखने और सच्चे मन से प्रार्थना करने का निर्देश दिया। देव पत्नियों ने उस दिन व्रत रखा और पति की रक्षा एवं विजय के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।

उनके अखंड विश्वास और समर्पण के कारण देवताओं ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इसी दिन से यह परंपरा शुरू हुई कि सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और खुशहाली के लिए करवा चौथ का व्रत रखें। उस समय चंद्रमा भी आकाश में प्रकट हुआ था, इसलिए व्रत चंद्रमा को देखकर खोलने की परंपरा चली।
साहसी करवा की कथा
करवा चौथ के नाम के पीछे एक और प्रसिद्ध कथा है साहसी करवा की, जिसने अपने पति के लिए यमराज से प्राण वापस लिए थे। कथा के अनुसार, करवा अपने पति से बेहद प्रेम करती थी। एक बार जब उसका पति नदी में स्नान कर रहा था, तब मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। करवा ने तुरंत एक कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांध दिया और यमराज से अपने पति की रक्षा करने का अनुरोध किया। यमराज ने शुरू में मना किया, लेकिन करवा के सतीत्व और प्रेम को देखकर उन्होंने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और पति को दीर्घायु का वरदान दिया।
इस घटना के बाद से करवा चौथ व्रत पति की रक्षा का प्रतीक बन गया।
वीरवती की कथा: व्रत के महत्व की सीख
एक और कथा वीरवती नामक रानी की है। उसने अपने सात भाइयों के साथ करवा चौथ मनाया था। पहली बार व्रत रखते हुए भूख-प्यास से व्याकुल वीरवती के भाइयों ने उसे छल से पहाड़ी पर दीपक जला कर चंद्रमा दिखा दिया। वीरवती ने उसे चंद्रमा समझकर अर्घ्य दिया और व्रत खोल लिया। व्रत टूटने के कारण उसके पति की मृत्यु हो गई।
वीरवती ने गहरे दुःख के साथ पूरे साल चतुर्थी तिथि का व्रत किया और अगली करवा चौथ विधिवत रखी। उसकी निष्ठा से चौथ माता प्रसन्न हुईं और उसके पति को पुनः जीवनदान मिला। इस घटना के कारण करवा चौथ पर चंद्रमा को छलनी से देखने की परंपरा शुरू हुई ताकि किसी भी भ्रम से बचा जा सके।











