Nobel Prize Economists: नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री एस्तेर ड्यूफलो और अभिजीत बनर्जी अगले वर्ष मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) छोड़कर स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख (UZH) में शामिल होंगे। यहां वे विकास अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एक नया केंद्र स्थापित करेंगे। यह कदम ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी विश्वविद्यालय और व्हाइट हाउस के बीच संघीय शोध निधि से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर विवाद चल रहा है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख ने शुक्रवार को बताया कि ये दोनों नोबेल पुरस्कार विजेता 1 जुलाई 2026 से यहां के अर्थशास्त्र विभाग में लेमान फाउंडेशन प्रोफेसर के पद पर शामिल होंगे। इस विश्वविद्यालय के अध्यक्ष फ्लोरियन स्केवर ने कहा कि ड्यूफलो और बनर्जी का आगमन “विश्व स्तरीय आर्थिक अनुसंधान के लिए ज्यूरिख की प्रतिष्ठा को एक महत्वपूर्ण झटका देगा।”

लेमान सेंटर की स्थापना
ड्यूफलो और बनर्जी यहां लेमान सेंटर फॉर डेवलपमेंट, एजुकेशन एंड पब्लिक पॉलिसी का सह-नेतृत्व करेंगे। यह केंद्र ब्राज़ील की लेमान फाउंडेशन की 26 मिलियन स्विस फ्रैंक (लगभग 32 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की दान राशि से समर्थित है। इसका उद्देश्य नीति-प्रासंगिक शोध को बढ़ावा देना और स्विट्जरलैंड तथा ब्राजील समेत दुनिया भर के शिक्षाविदों और नीति निर्माताओं को जोड़ना है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख के राष्ट्रपति माइकल शैपमैन ने कहा, “वे दो विश्व के सबसे प्रभावशाली अर्थशास्त्री हैं, जो वैज्ञानिक थ्योरी और सामाजिक प्रभाव को जोड़ते हैं। उनकी मौजूदगी हमारे संस्थान के मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता को मजबूत करेगी।”
MIT से जुड़ी जानकारी
हालांकि, ड्यूफलो और बनर्जी अपने MIT में पार्ट-टाइम पद बनाए रखेंगे और जेम्स जमीएल पॉवर्टी एक्शन लैब (J-PAL) का नेतृत्व जारी रखेंगे। उनका यह कदम ऐसे समय में आया है जब MIT ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए नए संघीय वित्त पोषण नियमों को पहली बार ठुकराया है।MIT की अध्यक्ष सैली कॉर्नब्लुथ ने अमेरिकी शिक्षा सचिव लिंडा मैकमहन को लिखे पत्र में कहा कि वह उस व्हाइट हाउस मेमो का समर्थन नहीं कर सकती, जिसमें अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या सीमित करने, विविधता कार्यक्रमों को कम करने और लिंग की परिभाषा को बदलने जैसी शर्तें शामिल हैं।
ट्रंप प्रशासन और विश्वविद्यालयों के बीच विवाद
ट्रंप प्रशासन ने शिक्षा क्षेत्र में कंजर्वेटिव एजेंडा को बढ़ावा देने के लिए कई नियम लागू किए हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या सीमित करना और जाति व लिंग के आधार पर भर्ती एवं प्रवेश प्रक्रिया पर रोक लगाना शामिल है। इन नियमों का पालन न करने वाले विश्वविद्यालयों को संघीय लाभ रोकने की धमकी भी दी गई है।
अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में कमी
संघीय आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2025 में अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। खासकर अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व से आने वाले छात्रों की संख्या में भारी कमी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कड़े वीज़ा नियम और यात्रा प्रतिबंध इसके प्रमुख कारण हैं।
एस्तेर ड्यूफलो और अभिजीत बनर्जी का MIT छोड़कर यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख जाना अमेरिकी शिक्षा क्षेत्र में बढ़ते राजनीतिक तनाव और शैक्षणिक स्वतंत्रता के मुद्दे को दर्शाता है। यह कदम वैश्विक शिक्षा के स्वरूप में बदलाव और तकनीकी, सामाजिक अनुसंधान में नए केंद्रों की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
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