Priyanka Chaturvedi News: अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को शामिल नहीं किए जाने के मुद्दे ने अब राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। इस घटना को लेकर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और भारत के संविधान की मूल भावना के खिलाफ” बताया।

“तालिबानी सोच का समर्थन नहीं कर सकते भारत में”
प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, “सब जानते हैं कि तालिबान की सोच महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानने की रही है। अफगानिस्तान में महिलाओं को शिक्षा, नौकरी और आज़ादी के बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया है। ऐसे में अगर भारत की धरती पर किसी प्रेस इवेंट में महिला पत्रकारों को ‘नो एंट्री’ कहा जाए, तो यह सीधा-सीधा तालिबानी सोच को स्वीकार करना है।”

MEA को तालिबान को लिखनी चाहिए आपत्ति पत्र
सांसद ने कहा कि भले ही यह प्रेस कॉन्फ्रेंस MEA (विदेश मंत्रालय) की डायरेक्ट मेज़बानी में नहीं हुई थी, लेकिन यह घटना भारत की संवैधानिक मर्यादाओं और प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात है। उन्होंने उम्मीद जताई कि विदेश मंत्रालय इस मामले को गंभीरता से संज्ञान में लेगा और अफगानिस्तान के प्रतिनिधियों को स्पष्ट संदेश देगा।
“मैं MEA से उम्मीद करती हूं कि वो अफगान दूतावास को पत्र लिखकर यह स्पष्ट करें कि भारत में महिला और पुरुष पत्रकारों को समान अधिकार प्राप्त हैं। उन्हें इस तरह के भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए,” चतुर्वेदी ने कहा।
“महिलाओं को बाहर रखना शर्मनाक”
प्रियंका चतुर्वेदी ने प्रेस में स्पष्ट कहा कि “महिलाओं को बाहर रखना न सिर्फ संविधान का अपमान है, बल्कि भारत की वैश्विक छवि पर भी सवाल खड़े करता है। यह बेहद शर्मनाक है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विदेशी प्रतिनिधि महिलाओं के साथ भेदभाव करें और हम चुप रहें।” उन्होंने यह भी कहा कि यह भारत के उन तमाम पत्रकारों का अपमान है जो हर परिस्थिति में सच को सामने लाने का कार्य करते हैं।
विपक्ष का सरकार पर निशाना
यह घटना सामने आने के बाद कांग्रेस, टीएमसी और शिवसेना (UBT) समेत कई विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि भारत, जो “नारी शक्ति” और “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों का नेतृत्व करता है, वहीं अपने ही देश में महिला पत्रकारों को ऐसे अपमानजनक तरीके से बाहर का रास्ता दिखाए जाने पर चुप कैसे रह सकता है?
अफगान विदेश मंत्री की भारत यात्रा को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस से रोकने की घटना न सिर्फ भारत की लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि यह तालिबानी मानसिकता के प्रति अनावश्यक सहिष्णुता भी दर्शाता है। अब देश की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या विदेश मंत्रालय इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाएगा या इसे कूटनीतिक शालीनता के नाम पर नजरअंदाज कर देगा।










