Political History India : लोकतांत्रिक इतिहास का महापरिवर्तन, नेहरू की मजबूत नींव बनाम मोदी के फैसलों की ऊंची उड़ान

Political History India : भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में 10 जून का दिन एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। इस खास तारीख को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के एक बेहद अनूठे और लंबे समय तक पद पर बने रहने के रिकॉर्ड को तोड़ने जा रहे हैं। यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि नरेंद्र मोदी यह कीर्तिमान देश के ‘चुने हुए प्रधानमंत्री’ के रूप में अपने नाम करने जा रहे हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहले आम चुनाव वर्ष 1951-52 में पूरी तरह संपन्न हो पाए थे, जबकि पंडित नेहरू वर्ष 1947 से ही अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में देश का सफल नेतृत्व कर रहे थे।

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यद्यपि अलग-अलग कालखंड के दो महान राजनेताओं की सीधी तुलना करना राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से पूरी तरह न्यायसंगत नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों ही नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल की चुनौतियों, वैश्विक परिस्थितियों और उपलब्ध समय के अनुसार राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देने का भरपूर प्रयास किया है। भारत जैसे जीवंत और सक्षम लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है कि यहाँ इस प्रकार के तुलनात्मक और वैचारिक विमर्श को हमेशा एक सकारात्मक स्थान मिलता है।

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साल 1947 के भारत की विकट परिस्थितियां और नेहरू के सामने खड़ीं बड़ी चुनौतियां

जब 15 अगस्त 1947 को भारत गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर आजाद हुआ, तब देश के सामने संकटों और विकट चुनौतियों का एक बहुत बड़ा पहाड़ खड़ा था। देश विभाजन के गहरे और दर्दनाक घाव पूरी तरह ताजे थे, जिसके चलते लगभग 1.4 करोड़ लोगों को अपनी जड़ों से उखड़कर इधर से उधर विस्थापित होना पड़ा था। उस दौर में देश की आर्थिक स्थिति पूरी तरह जर्जर हो चुकी थी और चारों तरफ बेइंतहा गरीबी का साम्राज्य था। साक्षरता की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और देश के महज 18 से 19 प्रतिशत नागरिक ही पढ़े-लिखे थे।

आम भारतीयों की औसत जीवन प्रत्याशा (आयु) भी मात्र 32 वर्ष के आसपास सिमटी हुई थी। औद्योगिक ढांचा न के बराबर था, कृषि पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर निर्भर थी और देश में खाद्यान्न की भारी किल्लत बनी हुई थी। चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाएं बेहद बदहाल थीं तथा सड़क, बिजली और सिंचाई के साधन अत्यंत सीमित थे। ऐसे संकटपूर्ण और संवेदनशील मोड़ पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश की कमान संभाली, जिनका मुख्य उत्तरदायित्व एक नए राष्ट्र रूपी इमारत की मजबूत बुनियादी नींव रखना था, जिसे आगे चलकर एक सफल लोकतंत्र बनना था।

नेहरू युग की महान उपलब्धियां: लोकतांत्रिक संस्थाओं और विज्ञान का उदय

पंडित नेहरू ने अपने दीर्घकालिक विजन से नवजात भारतीय लोकतंत्र को संस्थागत रूप से बेहद मजबूत करने का काम किया। वर्ष 1950 में देश का अपना संप्रभु संविधान पूरी तरह लागू हुआ और वर्ष 1951-52 में देश ने अपने पहले ऐतिहासिक आम चुनाव का सफल सामना किया। उस दौर में करोड़ों गरीब, वंचित और निरक्षर नागरिकों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर दुनिया को अचंभित कर दिया, जिसे वैश्विक इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग माना गया। नेहरू ने देश के सुचारू संचालन के लिए चुनाव आयोग, देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) और भारतीय संसद जैसी स्वायत्त संस्थाओं को स्थापित कर उन्हें मजबूत किया।

इसके साथ ही उन्होंने देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (साइंटिफिक टेंपर) को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन किया। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रयासों से वर्ष 1951 में देश के पहले आईआईटी (IIT खड़गपुर) की शुरुआत हुई, वर्ष 1956 में दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की स्थापना हुई और इसी वर्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) का भी गठन किया गया। इन शीर्ष संस्थानों ने आने वाले समय में देश को बेहतरीन डॉक्टर, इंजीनियर, कुशल वैज्ञानिक और दूरदर्शी नीति-निर्माता सौंपे।

आधुनिक भारत के मंदिर और नेहरू कालीन आर्थिक नीतियों की ऐतिहासिक सीमाएं

देश को खाद्यान्न संकट से उबारने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए नेहरू ने बड़ी नदी घाटी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड और दामोदर घाटी जैसी विशालकाय परियोजनाओं ने देश में सिंचाई नेटवर्क और बिजली उत्पादन की दिशा बदल दी। पंडित नेहरू ने इन भव्य बांधों और बिजली उत्पादन केंद्रों को बहुत गर्व से “आधुनिक भारत के मंदिर” की संज्ञा दी थी।

इसके अलावा, देश को औद्योगिक रूप से सशक्त बनाने के लिए भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे विशाल स्टील प्लांट सार्वजनिक क्षेत्र (PSU) के अंतर्गत स्थापित किए गए। विदेश नीति के मोर्चे पर नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) की नीति अपनाकर शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों गुटों से समान दूरी बनाए रखी, जिससे भारत को एक स्वतंत्र और संप्रभु अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। हालांकि, नेहरू युग की कुछ सीमाएं और नीतियां आलोचना के दायरे में भी आती हैं।

उनके काल में व्यापार और उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण बहुत अधिक बढ़ गया, जिसने आगे चलकर ‘लाइसेंस-परमिट राज’ को जन्म दिया, जिससे निजी उद्योगों की विकास दर काफी धीमी हो गई। इसके अलावा, वर्ष 1962 में चीन के साथ हुआ युद्ध भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका साबित हुआ, जिसने देश की तत्कालीन रक्षा तैयारियों की कमजोरियों को उजागर कर दिया।

साल 2026 का नया और आत्मनिर्भर इंडिया: वैश्विक बाजार और डिजिटल महाशक्ति

समय का चक्र तेजी से घूमा और वर्तमान समय यानी साल 2026 तक आते-आते भारत का स्वरूप पूरी तरह से परिवर्तित हो चुका है। वर्तमान भारत अब 140 करोड़ से भी अधिक की विशाल आबादी के साथ दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है, जिसे एक विशाल वैश्विक बाजार के रूप में देखा जाता है। आर्थिक मोर्चे पर भारत ने लंबी छलांग लगाते हुए दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव हासिल किया है। आज का भारत आधुनिक हवाई अड्डों, एक्सप्रेसवे, सर्वव्यापी मोबाइल नेटवर्क और हाई-स्पीड इंटरनेट से पूरी तरह लैस है।

डिजिटल भुगतान की क्रांति अब देश के सुदूर गांवों और कस्बों तक अपनी जड़ें जमा चुकी है। भारत आज अंतरिक्ष विज्ञान, फार्मास्यूटिकल्स, अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के क्षेत्र में एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में मजबूती से स्थापित हो चुका है। यह वह आधुनिक और आकांक्षी भारत है जिसकी मजबूत संस्थागत नींव भले ही हमारे पूर्ववर्ती जननायकों ने रखी थी, लेकिन इसकी विकास की गति को समकालीन दौर के साहसिक और त्वरित फैसलों ने एक नई और अकल्पनीय रफ्तार प्रदान की है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का संपूर्ण दौर इसी अभूतपूर्व और तेज नीतिगत बदलाव के लिए वैश्विक स्तर पर जाना जाता है।

मोदी सरकार की जनकल्याणकारी नीतियां: डिजिटल क्रांति और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर

वर्ष 2014 में सत्ता की बागडोर संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के भीतर व्यापक और बड़े पैमाने पर जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन शुरू हुआ। इस दौर का सबसे क्रांतिकारी बदलाव ‘डिजिटल गवर्नेंस’ और सेवाओं की ‘डायरेक्ट डिलीवरी’ के रूप में सामने आया। ‘जन धन योजना’ के अभूतपूर्व अभियान के तहत देश के करोड़ों गरीबों के 50 करोड़ से भी अधिक नए बैंक खाते खोले गए। इस वित्तीय समावेशन को जब बायोमेट्रिक पहचान तंत्र और मोबाइल कनेक्टिविटी से जोड़ा गया, तो ‘डीबीटी’ (Direct Benefit Transfer) का एक बेहद मजबूत और पारदर्शी ढांचा तैयार हुआ।

इसके माध्यम से सरकारी योजनाओं की वित्तीय सहायता बिना किसी बिचौलिए के सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचने लगी, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम कसी गई। ‘यूपीआई’ (UPI) प्रणाली ने तो भारत के संपूर्ण भुगतान परिदृश्य को ही बदलकर रख दिया। वर्ष 2016 में लॉन्च हुए इस डिजिटल टूल ने आम आदमी की वित्तीय आदतों को पूरी तरह बदल दिया, जिसके तहत वित्त वर्ष 2023-24 में 13 हजार करोड़ से अधिक के रिकॉर्ड डिजिटल लेनदेन दर्ज किए गए। आज एक छोटे रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर बड़े कॉर्पोरेट व्यापारी तक सभी डिजिटल क्यूआर (QR) कोड का सहजता से उपयोग कर रहे हैं।

इसके साथ ही, ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत देश भर में 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण कर इसे एक जन आंदोलन का रूप दिया गया। ‘उज्ज्वला योजना’ के माध्यम से 10 करोड़ से अधिक गरीब महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए, जबकि ‘आयुष्मान भारत योजना’ के अंतर्गत देश के गरीब परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये तक का मुफ्त स्वास्थ्य सुरक्षा कवच प्रदान किया गया। ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ के माध्यम से भी देश के करोड़ों अन्नदाताओं को प्रतिवर्ष 6 हजार रुपये की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता सीधे हस्तांतरित की जा रही है।

देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में आई अभूतपूर्व रफ्तार और कनेक्टिविटी का नया जाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की एक और सबसे बड़ी पहचान देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का तीव्र गति से कायाकल्प होना है। सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे, ग्रामीण विद्युतीकरण और नए हवाई अड्डों के निर्माण पर विशेष बजटीय जोर दिया। देश में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई जो वर्ष 2014 के आसपास महज 91 हजार किलोमीटर थी, वह वर्ष 2024 तक तेजी से बढ़कर 1.4 लाख किलोमीटर से भी अधिक विस्तृत हो चुकी है। देश में चालू हवाई अड्डों की संख्या भी पिछले एक दशक में लगभग दोगुनी हो चुकी है।

भारतीय रेलवे के क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक से निर्मित अत्याधुनिक ‘वंदे भारत’ जैसी सेमी-हाई स्पीड ट्रेनों ने देश में रेल यात्रा की पूरी तस्वीर और अनुभव को बदलकर रख दिया है। देश के प्रत्येक गांव तक बिजली ग्रिड पहुंचाने के बाद सरकार ने ‘जल जीवन मिशन’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की, जिसका मुख्य लक्ष्य हर घर तक ‘नल से जल’ पहुंचाना है। वर्ष 2019 में जहां ग्रामीण भारत के घरों में नल के कनेक्शन की संख्या मात्र 3 करोड़ के आसपास थी, वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 तक यह आंकड़ा 14 करोड़ से अधिक के स्तर को पार कर चुका था, जो जीवन स्तर में आए बड़े सुधार को दर्शाता है।

मोदी दौर के बड़े नीतिगत और कड़े फैसले: समर्थक बनाम आलोचक दृष्टिकोण

नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को राजनीतिक हलकों में उनके बेहद कड़े, साहसिक और कई बार विवादित नीतिगत फैसलों के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2016 में किया गया ‘विमुद्रीकरण’ (नोटबंदी) का फैसला हो या फिर वर्ष 2017 में पूरे देश में ‘एक देश, एक टैक्स’ की अवधारणा के तहत लागू की गई वस्तु एवं सेवा कर (GST) प्रणाली, इन फैसलों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नया मोड़ दिया। इसके बाद वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से ‘अनुच्छेद 370’ को निष्प्रभावी करने का ऐतिहासिक कदम उठाया गया, जिसने वहां की पूरी राजनीतिक दिशा बदल दी।

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए ‘तीन तलाक’ विरोधी कानून लाया गया, और वर्ष 2023 में संसद से ऐतिहासिक ‘महिला आरक्षण विधेयक’ पास कराकर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई। वर्ष 2024 में अयोध्या में प्रभु श्री राम मंदिर की भव्य प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई, जिसने देश के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर एक गहरा असर डाला। जहां मोदी के समर्थक इन सभी कदमों को एक बेहद मजबूत, निर्णायक और इच्छाशक्ति से भरपूर नेतृत्व का परिचायक मानते हैं, वहीं उनके आलोचक इन फैसलों को लागू करने के तौर-तरीकों और समाज के कुछ हिस्सों पर पड़े उनके तात्कालिक प्रभावों पर लगातार गंभीर सवाल भी उठाते रहे हैं।

विज्ञान, सुरक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर बढ़ता भारत का वैश्विक प्रभाव

मोदी के कार्यकाल में वैश्विक मंचों पर भारत की छवि पहले की तुलना में कहीं अधिक मुखर, आक्रामक और आत्मविश्वास से ओत-प्रोत दिखाई देती है। वर्ष 2023 में भारत ने अत्यंत सफलतापूर्वक विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों के समूह ‘जी-20’ (G-20) की अध्यक्षता की, जिसने भारत की कूटनीतिक धाक को पूरी दुनिया में मजबूत किया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने तब एक नया इतिहास रचा जब ‘चंद्रयान-3’ मिशन के तहत लैंडर ने चंद्रमा के दुर्गम दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र के पास दुनिया में पहली बार सफल सॉफ्ट लैंडिंग की।

वैश्विक महामारी कोविड-19 के संकटकाल के दौरान भारत ने न केवल अपने नागरिकों को 220 करोड़ से अधिक स्वदेशी वैक्सीन की डोज लगाई, बल्कि ‘वैक्सीन मैत्री’ के तहत दुनिया के दर्जनों जरूरतमंद देशों की मदद भी की। रक्षा के क्षेत्र में सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी नीतियों को कड़ाई से लागू किया, जिसके परिणामस्वरूप आज भारत न केवल अपनी सेनाओं के लिए आधुनिक हथियारों का निर्माण देश के भीतर कर रहा है, बल्कि रक्षा उपकरणों के निर्यात में भी एक नया रिकॉर्ड बना रहा है।

दोनों युगों की असली तुलना: नींव की मजबूती और संतुलित उड़ान की आवश्यकता

निष्कर्ष के तौर पर देखें तो पंडित जवाहरलाल नेहरू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकालों की कोई भी सीधी तुलना तकनीकी रूप से पूरी तरह न्यायसंगत नहीं हो सकती। पंडित नेहरू को विरासत में एक अत्यंत गरीब, अशिक्षित, विभाजित और संसाधनों से विहीन भारत मिला था, जहां उन्हें शून्य से शुरुआत करनी थी। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विरासत में पहले से स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं, एक विकसित बड़ा घरेलू बाजार और अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का एक मजबूत आधार मिला।

नेहरू का मुख्य ध्यान देश की बुनियादी संस्थाओं के निर्माण और उन्हें स्थापित करने पर केंद्रित था, जबकि मोदी का पूरा जोर त्वरित डिलीवरी, विशाल पैमाने (स्केल) और अत्यधिक कुशल डिजिटल गवर्नेंस सिस्टम पर रहा है।एक दौर ने देश को पैरों पर खड़ा करने का भगीरथ प्रयास किया, तो दूसरे दौर ने उसे वैश्विक मंच पर तीव्र गति से दौड़ाने का संकल्प लिया है। सरल शब्दों में कहें तो 1947 का भारत अस्तित्व बचाने के संघर्ष का दौर था, जबकि आज का इंडिया असीम आकांक्षाओं और वैश्विक नेतृत्व का दौर है।

भारत के विकास की यह गौरवगाथा किसी एक नेता या दल की कहानी नहीं है, बल्कि यह पिछली कई पीढ़ियों के सामूहिक श्रम और योगदान का परिणाम है। आज राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती और आवश्यकता यही है कि हमारे देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक ‘नींव’ भी पूरी तरह मजबूत बनी रहे और विकास की हमारी ‘उड़ान’ भी पूरी तरह संतुलित हो, ताकि वर्ष 2047 तक एक संपूर्ण ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय स्वप्न को हकीकत में बदला जा सके।

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Chandan Das

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