Avimukteshwaranand Statement: वाराणसी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश सरकार की गोरक्षा संबंधी नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि गोसंरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की नीतियों और वास्तविक हालात के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। इसके साथ ही उन्होंने हाल के छात्र आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि युवाओं के संघर्ष का परिणाम सामने आया है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का संकेत है।

छात्र आंदोलन को बताया लोकतंत्र की जीत
शंकराचार्य ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का जिक्र करते हुए कहा कि यह छात्रों के लंबे संघर्ष और लोकतांत्रिक दबाव का परिणाम है। उनके अनुसार किसी मंत्री का इस्तीफा पूरे तंत्र में बदलाव की गारंटी नहीं होता, लेकिन इससे जवाबदेही तय होती है और शासन व्यवस्था में जिम्मेदारी का संदेश जाता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता और युवाओं की आवाज का सम्मान होना चाहिए तथा शांतिपूर्ण आंदोलन व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाने का माध्यम बनते हैं।

गो यात्रा में शामिल लोगों पर कार्रवाई को लेकर उठाए सवाल
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि गोरक्षा का संकल्प लेने वालों और गो विशिष्ट संकल्प सभा में शामिल होने वाले लोगों को प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि कुछ समर्थकों को नोटिस दिए गए और उन्हें हाउस अरेस्ट किए जाने की भी जानकारी मिली। उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति गोरक्षा के समर्थन में यात्रा या सभा में शामिल होना चाहता है तो उसे रोकना उचित नहीं कहा जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि गोसंरक्षण की बात करने वाली सरकार ऐसे कदम क्यों उठा रही है।
81 दिवसीय गो रक्षा यात्रा का किया उल्लेख
शंकराचार्य ने अपनी 81 दिवसीय गो रक्षा यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा कि यात्रा के दौरान उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में लोगों से संवाद किया। उनका दावा था कि अधिकांश लोगों ने गाय को केवल पशु नहीं, बल्कि माता का दर्जा दिया। उन्होंने कहा कि समाज की आस्था गाय के प्रति सम्मान की है, इसलिए सरकारी स्तर पर भी इस भावना को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई जानी चाहिए। उनके अनुसार सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से गाय का विशेष महत्व है।
गो आश्रय केंद्रों की पारदर्शिता पर दिया जोर
उन्होंने प्रदेश के गो आश्रय केंद्रों की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। शंकराचार्य ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में गोसंरक्षण को लेकर गंभीर है तो पिछले तीन से चार महीनों की सभी सरकारी गो आश्रय केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक की जानी चाहिए। उनका कहना था कि इससे लोगों को वास्तविक स्थिति का पता चल सकेगा और यह स्पष्ट होगा कि गोवंश की देखभाल किस स्तर पर की जा रही है। उन्होंने पारदर्शिता को प्रभावी प्रशासन की आवश्यक शर्त बताया।
सरकारी गो नीति और विज्ञापनों पर जताई आपत्ति
शंकराचार्य ने सरकार की गो नीति की आलोचना करते हुए कहा कि सरकारी विज्ञापनों और जमीनी व्यवस्था में समानता दिखाई नहीं देती। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रचार सामग्री में आदर्श सरकारी गोशालाओं के बजाय निजी गोशालाओं की तस्वीरों का उपयोग किया जाता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश की पारंपरिक ‘गंगातीरी’ नस्ल के स्थान पर दूसरी नस्लों की तस्वीरें दिखाना स्थानीय विरासत की अनदेखी को दर्शाता है। उनके अनुसार सरकार को वास्तविक उपलब्धियों के आधार पर प्रचार करना चाहिए।
सरकार से पूछे कई महत्वपूर्ण सवाल
अपने संबोधन में शंकराचार्य ने सरकार से कई प्रश्न भी किए। उन्होंने गो आश्रय स्थलों की संख्या, गोवंश संरक्षण के दावों, नस्ल सुधार की योजनाओं, गोबर आधारित ऊर्जा परियोजनाओं, नंदनी कृषक समृद्धि योजना तथा नंद बाबा योजना के क्रियान्वयन पर स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि गोसंरक्षण के दावे इतने प्रभावी हैं तो बड़ी संख्या में गोवंश आज भी सड़कों और खेतों में क्यों दिखाई देता है। साथ ही उन्होंने दुग्ध उत्पादन के आंकड़ों में देशी गायों और अन्य नस्लों के योगदान को स्पष्ट करने की मांग की।
गाय के दर्जे को लेकर भी उठाया मूल प्रश्न
अपने वक्तव्य के अंत में शंकराचार्य ने सरकार के समक्ष यह मूल प्रश्न रखा कि राज्य की नीतियों में गाय को केवल एक पशु माना जाता है या माता का सम्मान दिया जाता है। उनका कहना था कि यदि समाज गाय को माता मानता है तो नीतियों और प्रशासनिक दृष्टिकोण में भी उसी भावना का प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि गोसंरक्षण केवल घोषणाओं या विज्ञापनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए प्रभावी योजनाओं, पारदर्शी व्यवस्था और ठोस क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
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