UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां अभी से तेज होने लगी हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती कई महीने पहले ही यह साफ कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल के साथ कोई गठबंधन या चुनावी समझौता नहीं करेगी। मायावती के इस ‘एकला चलो’ के संकल्प के बावजूद, उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में गठबंधन को लेकर कयासों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी बीच, बहुजन समाज पार्टी को एक बार फिर गठबंधन का एक नया और अप्रत्याशित प्रस्ताव मिला है, जिसने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने बढ़ाया बसपा की तरफ हाथ, दलित-मुस्लिम समीकरण पर जोर
दिलचस्प बात यह है कि बसपा को यह नया चुनावी ऑफर देश के दो मुख्य धड़ों, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) या विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन की ओर से नहीं मिला है। बल्कि यह प्रस्ताव हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की तरफ से आया है। बहराइच में 14 जून को होने वाली असदुद्दीन ओवैसी की एक बड़ी राजनैतिक रैली से ठीक पहले, एआईएमआईएम के उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने बहराइच पहुंचकर एक बड़ा बयान दिया। पत्रकारों से औपचारिक बातचीत के दौरान शौकत अली ने खुला प्रस्ताव रखते हुए कहा कि उनकी पार्टी आगामी 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर लड़ने की इच्छुक है।

नए राजनैतिक समीकरणों का दावा और सपा-कांग्रेस गठबंधन पर शौकत अली का तंज
शौकत अली ने इस संभावित गठबंधन के पीछे के सामाजिक समीकरण को समझाते हुए दावा किया कि उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम मतदाताओं का गठजोड़ एक बेहद मजबूत और अजेय राजनीतिक समीकरण साबित हो सकता है। उनके अनुसार, यदि यह दोनों वर्ग एक साथ आते हैं, तो इस ताकत के दम पर सूबे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) दोनों को ही कड़ी शिकस्त दी जा सकती है। अतीत का हवाला देते हुए एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने आपस में हाथ मिलाया था, लेकिन वे भाजपा के विजय रथ को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे थे। शौकत अली का मानना है कि केवल उनका सुझाया गठबंधन ही प्रदेश की राजनीति में एक अमूल्य और बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखता है।
कांग्रेस की पूर्व कोशिशें और सपा को परोक्ष रूप से दबाव में लाने की रणनीति
एआईएमआईएम से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी बसपा को अपने पाले में लाने या चुनावी तालमेल बिठाने की नाकाम कोशिश कर चुकी है। पिछले महीने ही बाराबंकी से कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ अचानक बसपा प्रमुख मायावती के लखनऊ स्थित आवास पर पहुंचे थे। हालांकि, उन्हें बसपा आलाकमान से मिलने का समय नहीं मिल सका और उन्हें वहां से बिना मुलाकात किए ही वापस लौटना पड़ा था। इस पर सफाई देते हुए कांग्रेस नेताओं ने कहा था कि उनकी इस यात्रा का कोई राजनैतिक उद्देश्य नहीं था और वे केवल बसपा सुप्रीमो के स्वास्थ्य का हालचाल जानने वहां गए थे। बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की इस कवायद का असल मकसद समाजवादी पार्टी को एक कड़ा संकेत देना था कि यदि सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं बनी, तो कांग्रेस के पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं।
ओवैसी के प्रस्ताव पर टिकीं सबकी नजरें
इन तमाम तेजी से बदलते घटनाक्रमों और एआईएमआईएम द्वारा खुले तौर पर दिए गए इस गठबंधन के प्रस्ताव के बाद, अब उत्तर प्रदेश की पूरी सियासत इस बात पर टिक गई है कि बहुजन समाज पार्टी और खुद मायावती की इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है। राजनैतिक हलकों में यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या दलित-मुस्लिम समीकरण के इस नए फॉर्मूले को देखकर बसपा प्रमुख अपने पुराने स्टैंड में कोई तब्दीली करेंगी, या फिर कांग्रेस की तरह ही ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की उम्मीदों पर भी पानी फिर जाएगा। आने वाले दिनों में बसपा का रुख यह तय करेगा कि 2027 के चुनाव त्रिकोणीय होंगे या फिर उत्तर प्रदेश को एक नया राजनैतिक मोर्चा देखने को मिलेगा।
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