Vrinda Vishnu Story : सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्रीहरि विष्णु को इस चराचर जगत का पालनहार माना गया है। सृष्टि की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए उन्होंने समय-समय पर पृथ्वी पर कई दिव्य अवतार लिए। त्रेतायुग में उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के रूप में जन्म लेकर अहंकारी लंकापति रावण का संहार किया और धरती पर पुनः धर्म का साम्राज्य स्थापित किया। इसके बाद द्वापरयुग में उन्होंने लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया और महाभारत के महायुद्ध में धर्म के पक्ष को विजय दिलाकर संसार को गीता का अमर संदेश दिया।

अवतारों की प्रेम कहानी
भगवान विष्णु ने जब-जब मनुष्य रूप में अवतार लिया, उन्हें मानवीय भावनाओं और कष्टों से भी गुजरना पड़ा। त्रेतायुग में साक्षात महालक्ष्मी ने माता सीता के रूप में जन्म लिया और वे श्रीराम की अर्धांगिनी बनीं। वहीं, द्वापरयुग में देवी रुक्मिणी श्रीकृष्ण की पटरानी बनीं। इसके बावजूद, भगवान विष्णु के इन दोनों ही महावतारों का सांसारिक प्रेम हमेशा अधूरा रहा। भगवान श्रीराम को जीवनभर माता सीता के विरह और वियोग की अग्नि में तड़पना पड़ा, तो वहीं श्रीकृष्ण ने राधा से अगाध प्रेम किया, लेकिन वे कभी एक-दूसरे के न हो सके।

जलंधर का बढ़ता आतंक
भगवान विष्णु के अवतारों को मिले इस विरह के पीछे एक अत्यंत प्राचीन और रोचक पौराणिक कथा छिपी है, जिसका संबंध देवी वृंदा के एक श्राप से है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में जलंधर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर असुर हुआ करता था। उसने अपने बल से तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। जलंधर को कोई भी देवता युद्ध में पराजित नहीं कर पा रहा था, क्योंकि उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म अत्यंत सुदृढ़ था। वृंदा के कठोर तप और अटूट निष्ठा के कारण जलंधर के चारों ओर एक ऐसा अदृश्य और दिव्य कवच बना रहता था, जिसे भेद पाना असंभव था।
देवताओं की करुण पुकार
जलंधर के अत्याचारों से तंग आकर जब देवताओं का सिंहासन डगमगाने लगा, तो भयभीत होकर इंद्र देव समेत सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में क्षीरसागर पहुंचे। भगवान विष्णु भली-भांति जानते थे कि जब तक वृंदा का पतिव्रता धर्म अक्षुण्ण रहेगा, तब तक जलंधर का वध कर पाना पूरी तरह असंभव है। ऐसे में सृष्टि के कल्याण और धर्म की मर्यादा को बचाने के लिए श्रीहरि विष्णु को एक बेहद कठोर और अप्रिय निर्णय लेना पड़ा। वे मायावी रूप धारण कर जलंधर के वेश में सीधे वृंदा के महल में पहुंच गए।
पतिव्रता धर्म का भंग होना
महल के आंगन में अपने पति जलंधर को सकुशल सामने खड़ा देखकर वृंदा अत्यंत प्रसन्न हो गई। उसने बिना संकोच किए आगे बढ़कर अपने पति रूपी भगवान विष्णु के पैर छुए। वृंदा के ऐसा करते ही उसका वर्षों पुराना पावन पतिव्रता धर्म और तप का दिव्य कवच उसी क्षण छिन्न-भिन्न हो गया। उधर, ठीक उसी समय युद्ध भूमि में देवताओं से लड़ रहे जलंधर का सुरक्षा कवच नष्ट हो गया, जिससे उसकी शक्तियां क्षीण हो गईं और भगवान शिव ने त्रिशूल से उसका वध कर दिया।

वृंदा का भयंकर श्राप
जब वृंदा को श्रीहरि विष्णु के इस लोक-कल्याणकारी छल और सत्य का आभास हुआ, तो उसका हृदय पूरी तरह टूट गया। जिस आराध्य को वह पूजती थी, उन्होंने ही उसकी भक्ति को हथियार बना लिया था। अत्यंत दुखी होकर वृंदा ने रोते हुए भगवान विष्णु को श्राप दिया कि, “जिस प्रकार आपने छल से मुझे मेरे पति से अलग किया है, ठीक उसी प्रकार आपके हर मानव अवतार का प्रेम हमेशा अधूरा रहेगा। जब आप राम बनेंगे तो सीता मिलेंगी तो सही, लेकिन पल भर में साथ छूट जाएगा। जब कृष्ण बनेंगे तो राधा से प्रेम तो अटूट होगा, पर कभी पूर्ण मिलन नहीं हो पाएगा।”
तुलसी का प्राकट्य और नारायण का वचन
वृंदा के इस तीखे श्राप को सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत शांत रहे और उन्होंने कहा कि तुम्हारा यह श्राप मेरे लिए दंड नहीं बल्कि एक तपस्या है, जिसे मैं सहर्ष स्वीकार करता हूं। इसके बाद आत्मग्लानि में डूबी वृंदा ने सती होकर अपने शरीर का त्याग कर दिया। उसकी चिता की भस्म से एक अत्यंत पवित्र और दिव्य पौधा उत्पन्न हुआ, जिसे आज हम ‘तुलसी’ के नाम से पूजते हैं। भगवान विष्णु ने तुलसी की पवित्रता को देखते हुए उन्हें वरदान दिया कि सृष्टि में जहां भी मेरी पूजा होगी, वहां तुम्हारा स्थान सबसे ऊंचा रहेगा और तुम्हारे बिना मेरी हर आराधना अधूरी मानी जाएगी।
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