Cancer Medicine Price : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सख्त टिप्पणी की। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ दवाओं की कीमत, जेनेरिक मेडिसिन, मेडिकल डिवाइस और डॉक्टरों की प्रिस्क्रिप्शन व्यवस्था से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस दौरान कोर्ट ने निर्माता से रिटेलर तक दवा की कीमत और उसके MRP में बड़े अंतर पर सवाल उठाया।
कैंसर की दवा के MRP पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने दवाओं की कीमतों में अंतर का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि कैंसर की एक जरूरी दवा का प्राइस टू रिटेलर यानी PTR करीब ₹2,700 था, जबकि उसका MRP ₹27,000 दर्ज था। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने मरीजों की आर्थिक मजबूरी का जिक्र करते हुए पूछा कि यदि यह ‘एक्सटॉर्शन’ नहीं है तो इसे क्या कहा जाएगा।
MRP और PTR में 10 गुना अंतर पर कोर्ट ने मांगा जवाब
कोर्ट ने सवाल किया कि जब निर्माता किसी दवा को MRP की लगभग 10 फीसदी कीमत पर रिटेलर को उपलब्ध करा रहा है, तो उसका MRP इतना अधिक रखने की जरूरत क्यों है। जस्टिस मेहता ने कहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज इलाज के लिए घर और गहने तक बेच देते हैं। ऐसे में दवाओं की कीमतों में असामान्य अंतर का असर सीधे मरीजों पर पड़ता है।
नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण का मुद्दा उठा
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि मौजूदा व्यवस्था में नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने पर प्रभावी नियंत्रण नहीं है। दावा किया गया कि देश में करीब 82 फीसदी दवाएं नॉन-शेड्यूल्ड श्रेणी में आती हैं। DPCO 2013 के तहत शेड्यूल-I में शामिल दवाओं पर मूल्य सीमा लागू होती है, जबकि अन्य दवाओं के मामले में निर्माता लॉन्च के समय कीमत निर्धारित कर सकता है।
60 हजार ब्रांड और सीमित मूल्य नियंत्रण को लेकर सवाल
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि देश में लगभग 60,000 दवा ब्रांड मौजूद हैं, जबकि मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था 5,000 से कम दवाओं या ब्रांड तक सीमित बताई गई। उनके मुताबिक, नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमत तय होने के बाद सालाना बढ़ोतरी पर भी निर्धारित सीमा लागू होती है, लेकिन शुरुआती कीमत को लेकर बड़ा सवाल बना हुआ है।
कई दवाओं में MRP और वास्तविक कीमत का बड़ा अंतर
सुनवाई में दवाओं के कई उदाहरण भी पेश किए गए। एक दवा का MRP ₹73 और PTR ₹22.75 बताया गया। दूसरी दवा का MRP ₹61 था, जबकि PTR ₹9.65 बताया गया। एक अन्य उदाहरण में ₹4,196 MRP वाली दवा ₹980 में उपलब्ध होने की बात कही गई। एंटीबायोटिक TG-BEX को लेकर भी प्रिंटेड कीमत और बिक्री मूल्य में करीब 1,500 फीसदी अंतर का दावा किया गया।
कॉरपोरेट अस्पतालों की दवा बिक्री व्यवस्था पर भी चर्चा
याचिकाकर्ता ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को कई बार अस्पताल के ही स्टोर से दवा खरीदने के लिए कहा जाता है। ऐसे मामलों में मरीजों के पास बाहर से सस्ती दवा खरीदने का विकल्प सीमित हो सकता है। इसके विपरीत, पारंपरिक मेडिकल स्टोर अपने मार्जिन में बदलाव कर सकते हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसका आर्थिक असर गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों पर पड़ता है।
सरकारी योजनाओं में महंगी दवाओं से टैक्सपेयर पर बोझ
सुप्रीम कोर्ट ने आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का भी संदर्भ दिया। जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया कि यदि किसी दवा की वास्तविक कीमत कम हो, लेकिन सरकारी भुगतान अधिक MRP के आधार पर किया जाए, तो अतिरिक्त खर्च आखिरकार सरकारी खजाने से जाता है। कोर्ट ने ऐसी स्थिति को प्रथम दृष्टया ‘फ्रॉड’ का मामला बताया और कहा कि सरकार को इस पर निर्णय लेना चाहिए।
जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता और प्रिस्क्रिप्शन पर बहस
सुनवाई में जेनेरिक दवाओं का मुद्दा भी सामने आया। याचिकाकर्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने कहा कि जेनेरिक दवाएं उपचार की लागत कम कर सकती हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता को लेकर मरीजों में सवाल हैं। उन्होंने डॉक्टर द्वारा केवल फॉर्मूलेशन लिखे जाने की स्थिति में फार्मासिस्ट की भूमिका पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जागरूक मरीज डॉक्टर द्वारा बताए गए फॉर्मूलेशन की ब्रांडेड दवा मांग सकता है।
केंद्र ने सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों पर विचार का भरोसा दिया
केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार मामले को प्रतिद्वंद्वी तरीके से नहीं देख रही है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था में सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों पर विचार किया जाएगा। सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना का भी उल्लेख किया, जहां कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। कोर्ट ने पूछा कि जिन दवाओं की जरूरत मरीजों को है, लेकिन वे जनऔषधि केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं, उनका क्या विकल्प होगा।
फार्मा कंपनियों ने रिटेल मार्जिन को बताया बड़ा कारण
इंडियन फार्मास्युटिकल एलायंस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि निर्माता दवाओं को अत्यधिक कीमत पर नहीं बेच रहे हैं और बड़ा मुनाफा रिटेलर के स्तर पर हो सकता है। इस पर जस्टिस मेहता ने सवाल किया कि MRP तो निर्माता ही निर्धारित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर के लिए निर्धारित की है। उस दिन केंद्र और कपिल सिब्बल की ओर से आगे की दलीलें सुनी जाएंगी।
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