TMC Split : लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों के मामले में अब फैसला लोकसभा स्पीकर ओम बिरला दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद ही लेंगे। इस संवेदनशील राजनीतिक मामले में स्पीकर ने निष्पक्षता बनाए रखते हुए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। स्पीकर कार्यालय की ओर से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट को ईमेल भेजकर उनका पक्ष स्पष्ट रूप से रखने के लिए औपचारिक रूप से बैठक के लिए आमंत्रित किया गया है।

ममता गुट के जवाब के बाद तय होगा आगे का कदम
सूत्रों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष पहले ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट से विस्तृत बातचीत करेंगे और उनका पक्ष सुनेंगे। इसके बाद ही बागी सांसदों के मामले में कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा। यह पूरा मामला संवैधानिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, इसलिए स्पीकर सभी पहलुओं की सावधानीपूर्वक समीक्षा कर रहे हैं।सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के लगभग 20 बागी सांसदों ने पहले लोकसभा स्पीकर से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने एक पत्र सौंपकर अपने नए समूह के रूप में मान्यता देने और कथित तौर पर ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय का अनुरोध किया था। इस कदम ने संसद में राजनीतिक हलचल को और बढ़ा दिया है।

स्पीकर कार्यालय ने ईमेल भेजकर मांगा आधिकारिक पक्ष
लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय ने इस पूरे मामले में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल टीएमसी गुट को औपचारिक ईमेल भेजा है। इस ईमेल के माध्यम से उनसे बागी सांसदों के दावे और उनके द्वारा किए गए विलय के अनुरोध पर अपना आधिकारिक पक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है।
मानसून सत्र से पहले होगा अंतिम निर्णय
सूत्रों का कहना है कि इस मामले पर अंतिम निर्णय संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले लिया जा सकता है, जो सामान्यतः जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। स्पीकर कार्यालय इस बात पर भी विचार कर रहा है कि क्या बागी गुट को अलग राजनीतिक समूह के रूप में मान्यता दी जा सकती है या नहीं।इस संवेदनशील मुद्दे पर निर्णय लेने से पहले केंद्रीय विधि मंत्रालय की लिखित राय ली जाएगी। मंत्रालय इस पर वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय पूरी तरह से संविधान के अनुरूप हो और भविष्य में किसी भी न्यायिक चुनौती का सामना कर सके।
संवैधानिक प्रावधानों की होगी गहन समीक्षा
इस मामले में संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों का विशेष रूप से अध्ययन किया जा रहा है। पूर्व संसदीय अधिकारियों और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक दलों के विलय को लेकर स्पष्ट नियम मौजूद हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों ने क्या कहा संवैधानिक स्थिति पर
लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचारी ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार केवल कोई राजनीतिक दल ही किसी अन्य दल में विलय कर सकता है। सांसद या विधायक व्यक्तिगत रूप से किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय नहीं ले सकते।आचारी के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल का नेतृत्व किसी अन्य दल में विलय का निर्णय लेता है, तो उसके सभी सांसदों और विधायकों को उस निर्णय से सहमत होना आवश्यक होता है। लेकिन केवल व्यक्तिगत स्तर पर किसी सांसद द्वारा किसी अन्य पार्टी में विलय का दावा संवैधानिक रूप से मान्य नहीं माना जा सकता।
न्यायिक समीक्षा से बचाव की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, विधि मंत्रालय और लोकसभा सचिवालय यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि जो भी निर्णय लिया जाए, वह भविष्य में अदालत में चुनौती दिए जाने पर भी टिक सके। इसलिए पूरे मामले में कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।टीएमसी के बागी सांसदों के इस कदम ने संसद में राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले दिनों में इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।
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