नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित अस्थियों को लेकर वर्षों से जारी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। रेनकोजी मंदिर में संरक्षित अस्थियों की प्रामाणिकता को लेकर दायर याचिका पर शुक्रवार को केंद्र सरकार अपना पक्ष अदालत के सामने रखेगी।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित अस्थियों को लेकर वर्षों से जारी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। रेनकोजी मंदिर में संरक्षित अस्थियों की प्रामाणिकता को लेकर दायर याचिका पर शुक्रवार को केंद्र सरकार अपना पक्ष अदालत के सामने रखेगी।

Netaji Mystery : स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु और जापान के रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखी गई कथित अस्थियों को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। इस मामले में केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखना है। अदालत ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या सरकार रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को भारत लाने के पक्ष में है और क्या सरकार इन्हें वास्तव में नेताजी की अस्थियां मानती है। इस संवेदनशील मामले की सुनवाई 7 अगस्त को निर्धारित है, जिस पर इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और नेताजी के समर्थकों की विशेष नजर बनी हुई है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अनीता बोस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी कथित अस्थियों को भारत लाने की मांग की है। उनका कहना है कि यह मामला कई दशकों से लंबित है और अब इसे और अधिक नहीं टाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान अस्थियों को भारत लाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसे अब पूरा किया जाना चाहिए। अनीता बोस का मानना है कि लंबे समय से उपलब्ध दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों के आधार पर इस विषय पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। अदालत जानना चाहती है कि सरकार इस मुद्दे पर क्या सोचती है और क्या वह रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को भारत लाने के पक्ष में है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि क्या सरकार इन अस्थियों को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां मानती है या इस संबंध में उसका कोई अलग दृष्टिकोण है। अदालत में केंद्र का जवाब इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नेताजी की मृत्यु को लेकर सबसे चर्चित सिद्धांत यह है कि 18 अगस्त 1945 को तत्कालीन ताइहोकू (वर्तमान ताइपे, ताइवान) में एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हुआ था। इस सिद्धांत के अनुसार दुर्घटना के बाद उनके पार्थिव अवशेषों का अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियां जापान के रेनकोजी मंदिर में सुरक्षित रखी गईं। हालांकि वर्षों से इस सिद्धांत को लेकर अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं और यह विषय आज भी विवाद का केंद्र बना हुआ है।
अनीता बोस का कहना है कि पिछले कई वर्षों में इस विषय पर अनेक दस्तावेज और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो चुकी हैं। उनके अनुसार उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की संभावना को स्वीकार किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि आवश्यक हुआ तो वह डीएनए परीक्षण के लिए अपना नमूना देने को भी तैयार हैं, ताकि वैज्ञानिक तरीके से यह स्पष्ट किया जा सके कि रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां वास्तव में नेताजी की हैं या नहीं।

हालांकि नेताजी के परिवार के सभी सदस्य इस विषय पर एकमत नहीं हैं। परिवार के कुछ सदस्यों और कई शोधकर्ताओं का मानना है कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु का सिद्धांत पूरी तरह प्रमाणित नहीं हुआ है। उनका कहना है कि इस मामले में कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। इसी कारण पहले भी जब कथित अस्थियों को भारत लाने की चर्चा हुई, तब परिवार के कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था।
नेताजी पर लंबे समय से शोध कर रहे कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्य विमान दुर्घटना सिद्धांत को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं करते। उनका तर्क है कि नेताजी के कई करीबी परिजनों ने भी इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया था। इस मुद्दे पर वर्षों से विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेज, गवाहियों और जांच आयोगों की रिपोर्टों को लेकर बहस चलती रही है। इसी कारण रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियों की प्रामाणिकता पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।
हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लेकर कई बयान चर्चा में रहे हैं। कुछ राजनीतिक नेताओं की टिप्पणियों के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक बहस देखने को मिली। नेताजी के समर्थकों और विभिन्न संगठनों ने इन बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की। इस बीच सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी उत्सुकता बनी हुई है।
अब पूरे देश की नजर 7 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर है, जब केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना आधिकारिक पक्ष रखेगी। अदालत में सरकार का रुख यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है कि रेनकोजी मंदिर में रखी कथित अस्थियों के संबंध में आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी। यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विरासत से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है।
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