West Bengal Politics : ऋतब्रत बनर्जी होंगे नेता प्रतिपक्ष, ममता बनर्जी गुट को मिला हाईकोर्ट से झटका

West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा के भीतर नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर छिड़ा विवाद अब न्यायिक गलियारों तक पहुँच गया है। इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार (18 जून, 2026) को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पीकर के निर्णय में फिलहाल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत के इस रुख के बाद, विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु द्वारा नियुक्त किए गए नेता प्रतिपक्ष की स्थिति फिलहाल बरकरार रहेगी। यह घटनाक्रम राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और उसके बागी विधायकों के बीच बढ़ते आंतरिक कलह को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

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क्या है पूरा मामला और विवाद की जड़?

विवाद की शुरुआत तब हुई जब टीएमसी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद उभरकर सामने आए। पार्टी की ओर से दो अलग-अलग दावेदारी पेश की गई थी। टीएमसी के आधिकारिक नेतृत्व वाले गुट ने अनुभवी नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय का नाम नेता प्रतिपक्ष के लिए प्रस्तावित किया था। वहीं, दूसरी ओर पार्टी के बागी विधायकों के गुट ने ऋतब्रत बनर्जी का नाम आगे बढ़ाया। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी गुट के प्रस्ताव को तरजीह देते हुए ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के पद पर नियुक्त कर दिया। अध्यक्ष के इस कदम के बाद से ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई थी।

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शोभनदेब चट्टोपाध्याय की याचिका और हाईकोर्ट का रुख

अध्यक्ष रथींद्र बसु के इस निर्णय को शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अपनी याचिका में उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे अनुचित करार दिया। गुरुवार को जस्टिस कृष्णा राव की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट कर दिया कि इस स्तर पर स्पीकर के फैसले पर कोई अंतरिम आदेश पारित करना उचित नहीं होगा। हाईकोर्ट का यह फैसला फिलहाल बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी की दावेदारी को मजबूती देता है और स्पीकर की संवैधानिक शक्तियों के तहत लिए गए निर्णय को यथावत रखता है।

अगली सुनवाई तक बरकरार रहेगी स्थिति

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों को अपनी बात विस्तार से रखने का निर्देश दिया है। जस्टिस कृष्णा राव ने याचिकाकर्ता और प्रतिवादी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपने-अपने जवाब और हलफनामे (Affidavit) दाखिल करने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की गई है। तब तक विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष के तौर पर ऋतब्रत बनर्जी ही अपना कार्यभार संभालेंगे।

राज्य की राजनीति पर पड़ता गहरा प्रभाव

यह न्यायिक घटनाक्रम न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि अपनी ही पार्टी के एक बागी विधायक का नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्त होना, पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े करता है। अब सभी की निगाहें 28 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि क्या विधानसभा की आंतरिक राजनीति में न्यायिक हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश है या स्पीकर का निर्णय ही अंतिम और सर्वमान्य रहेगा।

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