Surutapalli Temple : आमतौर पर देशभर के शिव मंदिरों के गर्भगृह में हमें शिवलिंग या भगवान शंकर की खड़ी मुद्रा वाली मूर्तियां देखने को मिलती हैं। लेकिन आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के सुरुतपल्ली गांव में स्थित ‘पल्लीकोंडेश्वर मंदिर’ एक ऐसा अद्भुत स्थान है, जो अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। यहाँ भगवान शिव शिवलिंग या नटराज रूप में नहीं, बल्कि देवी पार्वती की गोद में सिर रखकर ‘शयन मुद्रा’ (लेटी हुई मुद्रा) में विराजमान हैं। स्थानीय भाषा में इस दुर्लभ मुद्रा को ‘भोगन’ कहा जाता है। विजयनगर साम्राज्य के शासक हरिहर बुक्का राय द्वारा 1344 से 1377 ईस्वी के बीच निर्मित यह मंदिर न केवल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि गहरी पौराणिक आस्था का केंद्र भी है।

समुद्र मंथन और विषपान की पौराणिक कथा
पल्लीकोंडेश्वर मंदिर के पीछे छिपी पौराणिक कथा सीधे तौर पर ‘समुद्र मंथन’ की महागाथा से जुड़ी है। कथा के अनुसार, जब देवता और असुर मिलकर मंदराचल पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से समुद्र मंथन कर रहे थे, तो उस समय वासुकी नाग अत्यधिक पीड़ा और दबाव के कारण अपने मुख से अत्यंत घातक विष उगलने लगे। इस विष से पूरी सृष्टि के विनाश का संकट उत्पन्न हो गया। तब देवताओं और असुरों ने मिलकर भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की। करुणा के सागर भगवान शिव ने संसार को बचाने के लिए स्वयं उस भयानक विष का पान कर लिया। विष ग्रहण करने के बाद भगवान शिव को अत्यधिक थकान और चक्कर महसूस होने लगे, जिसके कारण वे वहीं विश्राम करने लगे।

नीलकंठ के रूप में शिव का अद्भुत त्याग
भगवान शिव की थकान को देखकर माता पार्वती व्याकुल हो गईं। उन्होंने तुरंत शिव का सिर अपनी गोद में रखा और विष को उनके शरीर के भीतर जाने से रोकने के लिए धीरे से उनके गले को दबाया। इस प्रयास के कारण विष शिव जी के गले में ही रुक गया और उनका कंठ नीला पड़ गया, जिससे उन्हें ‘नीलकंठ’ की उपाधि प्राप्त हुई। माता पार्वती का यह वात्सल्य और शिव का यह त्याग संसार के लिए एक बड़ा संदेश है। यह मंदिर उस पवित्र क्षण को समर्पित है, जहाँ महाकाल ने सृष्टि के कल्याण के लिए विष को अपने कंठ में धारण किया था। आज भी यहाँ की मूर्ति इस दैवीय घटना की जीवंत गाथा सुनाती है।
‘सुरुतपल्ली’ नामकरण और देवताओं का आगमन
इस स्थान का नाम ‘सुरुतपल्ली’ पड़ने के पीछे भी एक रोचक कारण है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव माता पार्वती की गोद में विश्राम कर रहे थे, तब भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और अन्य देवता, ऋषि-मुनि और नौ ग्रह उनके स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए उसी स्थान पर एकत्रित हुए। देवताओं के इस विशाल जमावड़े के कारण ही इस स्थान का नाम ‘सुरुतपल्ली’ पड़ा, जिसका अर्थ है ‘देवताओं का समागम स्थल’। समुद्र मंथन के तेरहवें दिन (त्रयोदशी) जब भगवान विष्णु अमृत लेकर प्रकट हुए, तो सभी देवता शिव के बलिदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए इसी स्थान पर आए थे। यही कारण है कि इस मंदिर में त्रयोदशी और प्रदोष काल का विशेष महत्व है, जहाँ भक्त आज भी अपनी नकारात्मकता को मिटाने के लिए दर्शन करने आते हैं।











