Manipur Violence : मणिपुर में जारी भीषण जातीय हिंसा के बीच एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। कुकी-जो समुदाय के शीर्ष संगठन, ‘कुकी-जो काउंसिल’ (KZC) ने पहली बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि उनके समुदाय के लोगों ने अपहरण किए गए छह लियांगमै नागा ग्रामीणों की नृशंस हत्या की थी। एक वीडियो संदेश के माध्यम से KZC के अध्यक्ष हेनलियानथांग थांगलेट ने इस घटना को एक ‘बड़ी भूल’ करार दिया। उन्होंने कहा कि नागा ग्रामीणों की हत्या के पीछे की वजह भावनाओं का आवेश और तत्काल परिस्थितियों का दबाव था। संगठन के प्रवक्ता गिंजा वुआलजोंग की मौजूदगी में दी गई इस प्रतिक्रिया को हिंसा प्रभावित मणिपुर में शांति बहाली की दिशा में एक बड़ा, हालांकि देर से उठाया गया कदम माना जा रहा है।

दर्दनाक घटना का विवरण और शवों की बरामदगी
यह स्वीकारोक्ति तब आई है जब मणिपुर की फिजाओं में इन हत्याओं के कारण भारी आक्रोश व्याप्त था। 13 मई को लेइलोन वैफेई गांव के समीप दो वाहनों पर हुए घातक हमले के दौरान इन छह नागा ग्रामीणों का अपहरण कर लिया गया था। उसी दिन हुए हमले में तीन थाडौ चर्च के नेताओं की भी हत्या कर दी गई थी। लापता हुए इन ग्रामीणों की तलाश लंबे समय तक चलती रही, लेकिन 11 जून को सुरक्षा बलों को उनके क्षत-विक्षत और सड़े-गले शव बरामद हुए। इस घटना ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था, जिससे नागा और कुकी समुदायों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था।

बंधक संकट और समुदाय के बीच बढ़ती खाई
इस त्रासदी की शुरुआत 13 मई को हुई चर्च नेताओं की हत्या के बाद उपजे ‘बंधक संकट’ से हुई थी। कुकी और नागा समूहों के बीच एक-दूसरे के सदस्यों को बंधक बनाने का सिलसिला शुरू हो गया था। तनाव को कम करने के लिए सुरक्षा बलों ने 15 मई को मध्यस्थता की, जिसके तहत दोनों पक्षों ने 14-14 लोगों की अदला-बदली की। 9 जून को नागा संगठनों ने सद्भावना दिखाते हुए शेष 14 कुकी बंधकों को भी रिहा कर दिया, लेकिन कुकी-जो समूहों की ओर से नागा बंधकों की रिहाई नहीं हुई, जिससे उनकी सुरक्षा पर गहरे सवाल उठने लगे थे। इन नागा ग्रामीणों की हत्या ने समुदायों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा कर दिया है।
एसओओ समझौते को खत्म करने की उठ रही मांग
इस घटना के बाद मणिपुर में नागा और मैतेई दोनों समुदायों ने एकजुट होकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। यूनाइटेड नागा काउंसिल (UNC) सहित कई संगठनों ने केंद्र से मांग की है कि 25 कुकी-जो सशस्त्र संगठनों के साथ चल रहे ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ (SoO) समझौते को तुरंत रद्द किया जाए। इन संगठनों का आरोप है कि ये सशस्त्र समूह ही राज्य में जारी जातीय हिंसा को हवा दे रहे हैं और शांति प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। गौरतलब है कि थाडौ समुदाय के भीतर भी पहचान को लेकर आंतरिक मतभेद चल रहे हैं, जो इस जटिल स्थिति को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस कबूलनामे के बाद स्थिति को संभालने के लिए क्या कदम उठाता है।
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