Ram Mandir Trust : अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और संचालन को लेकर चर्चाओं का बाजार हमेशा गर्म रहता है। इसी बीच, ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ की कार्यप्रणाली और सरकारी जवाबदेही को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण सामने आया है। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने अपने एक हालिया आदेश में यह साफ कर दिया है कि राम मंदिर परिसर का प्रबंधन देखने वाला यह ट्रस्ट एक पूर्णतः स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह ट्रस्ट आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के दायरे में नहीं आता है। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार का इस ट्रस्ट पर न तो कोई प्रशासनिक नियंत्रण है और न ही इसे कोई प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्राप्त होती है। यह फैसला आरटीआई के माध्यम से मंदिर प्रबंधन से जुड़ी जानकारी मांगने वालों के लिए एक बड़ा संकेत है।

आरटीआई आवेदन की पृष्ठभूमि: नीरज शर्मा का सवाल और आयोग का आदेश
इस पूरे मामले की शुरुआत साल 2024 की शुरुआत में हुई, जब नीरज शर्मा नामक एक व्यक्ति ने आरटीआई अधिनियम के तहत केंद्र सरकार से राम मंदिर ट्रस्ट के जन सूचना अधिकारियों के नाम और विवरण की मांग की थी। शुरुआत में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस अपील को खारिज कर दिया, जिसके बाद यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा। हाई कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग को निर्देश दिया कि वह गृह मंत्रालय से इस संबंध में जवाब तलब करे और यह सुनिश्चित करे कि क्या राम मंदिर ट्रस्ट को ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ (Public Authority) की श्रेणी में रखा जा सकता है।
सूचना आयोग ने तमाम कानूनी पहलुओं और सरकारी दस्तावेजों का गहन मूल्यांकन करने के बाद अपना अंतिम आदेश जारी किया। आयोग ने स्पष्ट कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गठित एक पूर्णतः स्वतंत्र संगठन है, इसलिए इसे ‘पब्लिक अथॉरिटी’ नहीं माना जा सकता और इसकी आंतरिक कार्यप्रणाली आरटीआई एक्ट के अंतर्गत नहीं आती है।
क्या ट्रस्ट के पदाधिकारियों को हटाया जा सकता है? आंतरिक शक्तियों का विश्लेषण
चूंकि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्व-संचालित निकाय है, इसलिए देश की किसी भी वैधानिक या सरकारी संस्था के पास इसके पदाधिकारियों, जैसे कि महासचिव चंपत राय या अनिल मिश्रा को सीधे तौर पर पद से बर्खास्त करने की कोई शक्ति नहीं है। उनके भविष्य या उनके कार्यकाल में किसी भी प्रकार का बदलाव करने का एकमात्र अधिकार ट्रस्ट के स्थायी सदस्यों के पास ही सुरक्षित है। ट्रस्ट के नियमों के अनुसार, किसी भी बड़े फैसले या बदलाव के लिए सदस्यों के बीच आम सहमति का होना अनिवार्य है। यदि कोई पदाधिकारी पद छोड़ना चाहता है या ट्रस्ट में कोई बदलाव करना आवश्यक हो जाता है, तो इसके लिए सदस्यों की आपसी बैठक और सर्वसम्मति ही एकमात्र रास्ता है। वर्तमान में, बाहरी किसी भी प्रशासनिक संस्था का इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप कानूनी रूप से संभव नहीं है।
सरकारी प्रतिनिधियों की भूमिका: पदेन सदस्य लेकिन मताधिकार रहित
ट्रस्ट के कुल 15 सदस्यों की संरचना अत्यंत विशिष्ट है। हालांकि, इसमें केंद्र और राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले 4 आईएएस अधिकारी शामिल हैं—जैसे कि गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रशांत लोखंडे और उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद—लेकिन इनकी भूमिका केवल ‘पदेन सदस्य’ तक सीमित है। ट्रस्ट के संविधान और नियमों के मुताबिक, इन सरकारी प्रतिनिधियों के पास ट्रस्ट के निर्णयों में वोट देने का कोई अधिकार नहीं है। वे बैठकों में शामिल होकर अपना पक्ष रख सकते हैं या सरकार की ओर से निगरानी रख सकते हैं, लेकिन नीतिगत निर्णयों में उनकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं है। यह स्पष्ट करता है कि ट्रस्ट पूरी तरह से गैर-सरकारी और स्वायत्त तरीके से संचालित होता है।
सदस्यता का गणित और निर्णय प्रक्रिया: बहुमत का महत्व
वर्तमान में ट्रस्ट के 15 सदस्य पदों में से कुछ बदलाव भी हुए हैं। कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद कृष्ण मोहन को ट्रस्ट में शामिल किया गया, जबकि विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा के निधन के बाद एक सीट अभी भी रिक्त है। यदि चंपत राय और अनिल मिश्रा को मिलाकर देखें, तो शेष बचे 10 वोटिंग सदस्यों में से किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय के लिए कम से कम 6 सदस्यों की आम सहमति अनिवार्य है।
मंदिर के आंतरिक मामलों से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि ट्रस्ट की बैठकें हर तीन महीने में बुलाई जाती हैं। पिछले बैठक का मुख्य एजेंडा राम नवमी की भव्य तैयारियों को अंतिम रूप देना था। ट्रस्ट ने अपनी तकनीक का विस्तार करते हुए अब आईटी विभाग के जरिए वर्चुअल माध्यम से भी बैठकों का आयोजन करना शुरू कर दिया है, ताकि जो सदस्य व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न हो सकें, वे भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से चर्चा में शामिल हो सकें।
ट्रस्ट के प्रमुख चेहरे और उनका ऐतिहासिक योगदान
फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2019 के ऐतिहासिक आदेश के अनुपालन में स्थापित इस ट्रस्ट में देश के कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्व शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष की पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन इस ट्रस्ट के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं, और उनके दिल्ली स्थित आवास को ही ट्रस्ट का रजिस्टर्ड कार्यालय बनाया गया है। ट्रस्ट के अन्य सदस्यों में प्रयागराज के स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, उडुपी के स्वामी विश्वप्रसन्नातीर्थ, हरिद्वार के युगपुरुष परमानंद गिरि और निर्मोही अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास जैसे धार्मिक गुरु शामिल हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक दृष्टिकोण से पूर्व आईएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्रा को निर्माण समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो मंदिर के निर्माण कार्यों की बारीकी से देखरेख करते हैं।
वीआईपी पास और प्रशासनिक अधिकार: शक्तियों का केंद्रीकरण?
एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहलू जो हाल के दिनों में चर्चा में रहा है, वह है वीआईपी पास और आरती से जुड़ी अनुमतियां जारी करने का अधिकार। वर्तमान में, यह मुख्य प्रशासनिक शक्तियां महासचिव चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा और गोपाल नागरकट्टे के पास केंद्रित हैं। यह शक्ति का केंद्रीकरण ट्रस्ट के भीतर एक संवेदनशील विषय बना हुआ है, क्योंकि अन्य पदाधिकारियों की भूमिकाएं काफी सीमित महसूस की जा रही हैं। गोपाल नागरकट्टे (राव), जो जनवरी 2021 से निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे हैं, को बाद में ट्रस्ट के आमंत्रित सदस्यों में शामिल किया गया था। यद्यपि उनकी नियुक्ति की तिथि पर स्पष्टता का अभाव है, लेकिन वे वर्तमान में चंपत राय और अनिल मिश्रा के बाद सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक हैं।
क्या भविष्य में बदलाव संभव है?
राम मंदिर ट्रस्ट की वर्तमान संरचना और इसके प्रशासनिक ढांचे को देखते हुए यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट अपने आंतरिक मामलों में पूरी तरह से स्वतंत्र है। सरकारी प्रतिनिधियों की मौजूदगी महज औपचारिकता और समन्वय के लिए है, न कि नियंत्रण के लिए। भविष्य में यदि ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में किसी बड़े परिवर्तन या सदस्यों के निष्कासन की आवश्यकता पड़ती है, तो वह केवल और केवल ट्रस्ट की आंतरिक बैठक और सदस्यों के बहुमत के आधार पर ही संभव होगा। बाहरी सरकारी दबाव या आरटीआई जैसे माध्यमों से इसमें बदलाव की गुंजाइश नगण्य है।
ट्रस्ट के सदस्य भविष्य में किसी भी बड़े बदलाव की आवश्यकता महसूस होने पर अपनी अगली रणनीति पर चर्चा कर सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा ट्रस्ट के स्थायी सदस्यों के ही हाथों में रहेगा। राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के लिए यह स्वायत्तता जहां एक ओर प्रशासनिक सुगमता प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर पारदर्शी और जवाबदेह कामकाज की जिम्मेदारी भी उन्हीं सदस्यों के कंधों पर डालती है।
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