Ramgarh Hill : छत्तीसगढ़ के रामगढ़ पर्वत क्षेत्र में नई कोयला खदान, ‘केते एक्सटेंशन’ को मिली मंजूरी ने एक गंभीर विवाद को जन्म दे दिया है। एक ओर जहाँ यह क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक, साहित्यिक और धार्मिक धरोहर के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक विकास की ललक ने इसके पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं।

विडंबना यह है कि सरकार एक तरफ प्रतिवर्ष भव्य ‘रामगढ़ महोत्सव’ का आयोजन करती है, जिसमें पर्वत की सांस्कृतिक महिमा का गुणगान किया जाता है, तो दूसरी ओर उसी पर्वत के निकट खनन की अनुमति दी जा रही है। इस साल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की महोत्सव में उपस्थिति और उनके द्वारा पर्वत के महत्व पर चर्चा के बावजूद, नई खदान का निर्णय लोगों को समझ से परे लग रहा है। स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों का डर है कि यदि खनन शुरू हुआ, तो रामगढ़ पर्वत की सदियों पुरानी विरासत हमेशा के लिए मिट जाएगी।

आस्था बनाम उद्योग: ग्रामीणों का गहरा आक्रोश
रामगढ़ पर्वत के साथ स्थानीय निवासियों की भावनाएं अटूट रूप से जुड़ी हैं। स्थानीय निवासी तिहारु लाल कहते हैं, “हमारी आस्था इस पर्वत से जुड़ी है। भगवान राम वनवास के दौरान यहां रुके थे। पर्वत के ऊपर सीता-राम और लक्ष्मण का प्राचीन मंदिर है। यदि खनन से पर्वत क्षतिग्रस्त हुआ और दरारें बढ़ीं, तो यह मंदिर भी ध्वस्त हो जाएगा।” ग्रामीणों का मानना है कि उनकी रोजी-रोटी और पहचान का आधार यही जंगल और पर्वत है, जिसे वे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहते। उनका स्पष्ट कहना है कि विकास के नाम पर विनाश उन्हें स्वीकार नहीं है, क्योंकि जो क्षति पर्यावरण को होगी, उसकी भरपाई कोई भी सरकारी योजना नहीं कर सकती।
पर्यावरणविदों की चेतावनी: ‘आंकड़ों से कहीं अधिक होगा विनाश’
हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के संस्थापक सदस्य आलोक शुक्ला ने इस परियोजना पर कड़ा प्रहार किया है। उनका तर्क है कि राजस्थान सरकार की आवश्यकता का हवाला देकर जो कोयला निकाला जा रहा है, उसकी आपूर्ति पहले ही पर्याप्त है। उन्होंने आरोप लगाया कि खनन का दायरा जरूरत से कहीं ज्यादा बढ़ाया जा रहा है ताकि कॉरपोरेट जगत इसका लाभ उठा सके। शुक्ला के अनुसार, सरकारी आंकड़ों में भले ही 4 लाख पेड़ काटने की बात कही जा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि परियोजना के प्रभाव में 10 लाख से अधिक पेड़ नष्ट हो जाएंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि रामगढ़ पर्वत को नहीं बचाया गया, तो यह न केवल हसदेव क्षेत्र की बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के पर्यावरणीय संतुलन के लिए एक अपूरणीय क्षति होगी।
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव का तीखा प्रहार
राज्य की खनन नीति पर सवाल उठाते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने एक विस्तृत चिंता साझा की है। उन्होंने कहा कि हसदेव से शुरू हुआ खनन का दायरा आज पूरे छत्तीसगढ़ में फैल चुका है। उन्होंने धरमजयगढ़ रेंज, बस्तर के 18 खदानों, कवर्धा का प्रस्तावित टाइगर रिजर्व, गरियाबंद और बलरामपुर जैसे क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह से राज्य के प्रमुख जंगलों को औद्योगिक परियोजनाओं के लिए सौंपा जा रहा है। सिंहदेव के मुताबिक, विकास के नाम पर हो रहे इस विस्थापन का शिकार सबसे अधिक स्थानीय आदिवासी हो रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जमीन छिन जाने के बाद उन परिवारों का क्या होता है जो कभी अपनी जमीन के मालिक थे? विस्थापन के बाद की उनकी दयनीय स्थिति पर उन्होंने गहरा सवालिया निशान लगाया है।
मुख्यमंत्री का पक्ष: ‘विकास के लिए पेड़ काटना अनिवार्य’
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस विवाद पर सरकार का स्पष्ट रुख रखा है। उन्होंने आलोचकों से अपील की कि वे उद्योग नीति और वृक्षारोपण की बारीकियों को समझें। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ का 44 प्रतिशत भू-भाग वनों से आच्छादित है, जो कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफी बेहतर है। उन्होंने कैंपा योजना और प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि पेड़ काटने के बदले सरकार कई गुना अधिक वृक्षारोपण सुनिश्चित करती है। मुख्यमंत्री ने विकास की आवश्यकता को समझाते हुए कहा, “यदि हमें नेशनल हाईवे जैसे बुनियादी ढांचे का विस्तार करना है, तो पेड़ तो काटने ही पड़ेंगे। क्या सड़कें आसमान में बनेंगी?” उन्होंने स्पष्ट किया कि उद्योग नीति में यह प्रावधान है कि औद्योगिक विकास के दौरान हुए नुकसान की भरपाई अनिवार्य रूप से की जाए।
धरोहर का भविष्य: क्या केवल महोत्सव काफी है?
रामगढ़ पर्वत का भविष्य अब एक बड़े मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ विकास की वह गति है जिसे सरकार अनिवार्य मानती है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण और आस्था का वह सवाल है जिसे जनता और पर्यावरणविद उठा रहे हैं। रामगढ़ पर्वत पर पहले से ही दरारें देखी जा रही हैं, जो खनन के प्रभाव से और गंभीर हो सकती हैं। आज प्रदेश के लोग केवल एक खदान के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी नीति के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं जो जंगलों के अस्तित्व पर सवाल उठाती है।
अंततः प्रश्न यह है कि क्या विकास की गति को और अधिक पर्यावरण-अनुकूल नहीं बनाया जा सकता? यदि सांस्कृतिक महोत्सवों के माध्यम से हम रामगढ़ की महिमा का गुणगान करते हैं, तो उस पर्वत को अक्षुण्ण रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच का यह टकराव आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति और नीति निर्धारण का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु रहने वाला है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपनी औद्योगिक नीतियों को किस प्रकार संशोधित करती है ताकि विकास की दौड़ में धरोहरों का अस्तित्व सुरक्षित रह सके।
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