Mohan Bhagwat: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में वैश्विक स्तर पर संघ के बढ़ते प्रभाव और स्वीकार्यता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज दुनिया भर के लोग संघ के कार्य पद्धति और प्रशिक्षण शैली को देखने के लिए आकर्षित हो रहे हैं। पांचों महाद्वीपों से आने वाले प्रतिनिधि न केवल संघ की कार्यप्रणाली का अध्ययन कर रहे हैं, बल्कि वे यह भी जानने के इच्छुक हैं कि क्या संघ उनके संबंधित देशों के युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए अपना मॉडल उन्हें सिखा सकता है। भागवत ने कहा कि यह इस बात का प्रमाण है कि आरएसएस के पास व्यक्तित्व निर्माण की जो प्रभावी पद्धति है, वैसी दुनिया में कहीं और उपलब्ध नहीं है। पहले यह केवल चर्चा का विषय था, लेकिन अब यह वास्तविकता पूरी दुनिया को दिखाई दे रही है।

पर्दे के पीछे से संचालन की धारणा का खंडन
कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने उन भ्रामक धारणाओं को भी पूरी तरह खारिज किया, जिनमें यह दावा किया जाता है कि आरएसएस उन सभी संगठनों को पर्दे के पीछे से नियंत्रित या संचालित करता है, जिनसे उसके स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत संगठनों का संचालन केंद्र स्तर से संघ द्वारा किया जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। उन्होंने कहा कि संघ का प्राथमिक उद्देश्य केवल गतिविधियों का संचालन करना नहीं है, बल्कि एक ऐसे आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में निस्वार्थ भाव से सेवा करने में पूर्णतः सक्षम हो। स्वयंसेवक अपनी व्यक्तिगत प्रेरणा से अलग-अलग संगठनों में कार्य करते हैं, और उन्हें नियंत्रित करना संघ का मिशन नहीं है।

व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य
आरएसएस प्रमुख ने दोहराया कि संघ का मिशन केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक लक्ष्य राष्ट्र को विजयी बनाना और ‘धर्म’ की रक्षा करने की शक्ति को सुरक्षित रखना है। उन्होंने आह्वान किया कि जो लोग हिंदू राष्ट्र का हिस्सा हैं, उनका यह परम कर्तव्य है कि वे देश के धर्म की रक्षा करें और स्वयं भी उसका पालन करें। भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि धर्म की रक्षा का अर्थ केवल बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा नहीं है, बल्कि उसके संरक्षण और दैनिक जीवन में उसके मूल्यों का पालन करना भी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन मूल्यों को आत्मसात करके ही भारत एक गौरवशाली और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर सकता है, जो आने वाले समय में विश्व को सही मार्ग दिखा सके।
संघ के शताब्दी समारोह और प्रचारकों का योगदान
यह संबोधन ‘डॉ. हेडगेवार: आधुनिक युग के शालिवाहन’ नामक यूट्यूब वीडियो के सार्वजनिक प्रसारण के दौरान दिया गया। इस कार्यक्रम में मोहन भागवत ने संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आरएसएस के 100 प्रचारकों के जीवन पर आधारित वीडियो श्रृंखला भी जारी की। ये प्रचारक संगठन के पूर्णकालिक स्वयंसेवक होते हैं, जो अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा और संघ के विस्तार के लिए समर्पित कर देते हैं। भागवत ने रेखांकित किया कि जैसे-जैसे संघ अपने कार्यों का विस्तार कर रहा है, समाज में इसके प्रति सम्मान और स्वीकार्यता का भाव भी बढ़ा है। उन्होंने कहा कि शुरुआती वर्षों में संघ को जिस उपेक्षा या गलतफहमी का सामना करना पड़ा था, वह अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है, क्योंकि लोग अब संघ के राष्ट्र निर्माण के संकल्प और उसके जीवन-मूल्यों को गहराई से समझ रहे हैं।
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