Donation Controversy : अयोध्या के राम मंदिर में दानपात्र से हुई कथित लूट का मामला अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जिसने न केवल धार्मिक आस्था को झकझोर दिया है, बल्कि देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस विवाद के केंद्र में हैं—महिपाल सिंह। महिपाल, जो ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के अकाउंट्स डिपार्टमेंट में सुपरवाइजर थे, आज एक अज्ञात भय के साये में ‘हाउस अरेस्ट’ जैसी स्थिति में रहने को मजबूर हैं। उन्होंने ही सबसे पहले मंदिर के दान में हो रही धांधली के खिलाफ आवाज उठाई थी। आज, जब वे एक ‘व्हिसलब्लोअर’ के रूप में अपनी जान बचाने के लिए घर में दुबके हैं, तो सवाल यह उठता है कि क्या भगवान के खजाने की सुरक्षा करने वालों ने ही उसे लूट लिया?

महिपाल सिंह का संघर्ष और खामोशी की मजबूरी
महिपाल की वर्तमान स्थिति अत्यंत दयनीय है। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, जिसके चलते वे अपने बिस्तर तक सीमित रहने को विवश हैं। मंदिर प्रबंधन ने न केवल उनके दावों को सिरे से खारिज किया, बल्कि उनकी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। उनकी चुप्पी के पीछे का कारण डर है; उन्होंने बस इतना ही कहा है कि, “मैंने जो देखा, वही कहा, अब इससे ज्यादा बोलने की हिम्मत नहीं है।” दूसरी ओर, अयोध्या बार एसोसिएशन ने यह घोषणा कर दी है कि कोई भी वकील महिपाल का केस नहीं लड़ेगा। यदि कोई वकील उनके पक्ष में खड़ा होता है, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा और उसे तीन दिनों के भीतर अयोध्या छोड़ना होगा। यह स्थिति न्याय प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।

राजनीतिक घमासान और SIT का गठन
7 जून को जब समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को सार्वजनिक मंच पर उठाया, तो यह मामला एक छोटे से विवाद से बदलकर ‘सोप ओपेरा’ जैसी राजनीतिक महागाथा बन गया। मंदिर प्रबंधन जो पहले इन आरोपों को ‘अवास्तविक’ कहकर टाल रहा था, अब वह खुद इन आरोपों के जाल में फंस चुका है। जनदबाव के कारण उत्तर प्रदेश सरकार को मजबूरन एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करनी पड़ी। अब तक इस मामले में 8 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और 80 लाख रुपये बरामद किए गए हैं। हालांकि, विपक्ष का दावा है कि यह लूट केवल नकद तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों के सोने-चांदी के गहने भी गायब हैं।
मंदिर प्रबंधन के इस्तीफे और चुप्पी
इस पूरे प्रकरण में मंदिर मैनेजमेंट कमेटी के दो प्रमुख सदस्यों, चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि वे दोषी हैं, तो अब तक उन पर FIR क्यों नहीं हुई? राम मंदिर ट्रस्ट, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत केंद्र सरकार की देखरेख में बनाया गया था, के 15 में से 12 सदस्य सरकार द्वारा चुने गए हैं। मंदिर निर्माण कमेटी के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा थे। इस पूरे प्रशासनिक ढांचे के बावजूद, प्रधानमंत्री की चुप्पी ने कई संदेहों को जन्म दिया है। क्या राम के खजाने की सुरक्षा अब केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है?
शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार: NEET से लेकर TET तक
इस विवाद के समानांतर देश में शिक्षा व्यवस्था के पतन की खबरें भी सुर्खियां बटोर रही हैं। NEET परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने से लेकर CBSE के कथित स्कैम तक, हर जगह भ्रष्टाचार की बू आ रही है। लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है, फिर भी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जिम्मेदारी लेने के बजाय मौन साधे हुए हैं। जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक और अन्य छात्र शांतिपूर्ण धरना दे रहे हैं, लेकिन प्रशासन उनके साथ अमानवीय व्यवहार कर रहा है। बिजली का कनेक्शन काट देना और खाने-पीने तक की सुविधा न देना, सरकार के उस रवैये को दर्शाता है जो अपने ही नागरिकों को ‘देशद्रोही’ या ‘विदेशी एजेंट’ करार देने में संकोच नहीं करता।
भ्रष्टाचार की लहर और ‘डबल इंजन’ सरकार
पिछले एक दशक में देश भर में कम से कम 30 बड़े भर्ती परीक्षाएं पेपर लीक का शिकार हुई हैं, जिससे सौ से अधिक छात्रों ने आत्महत्या कर ली। पश्चिम बंगाल जैसे गैर-BJP शासित राज्यों में भ्रष्टाचार का विरोध करना तो समझ में आता है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, BJP शासित राज्यों में भी ऐसे मामले सामने आने पर या तो उन्हें छिपाया जाता है या फिर मुख्यमंत्रियों को ‘क्लीन चिट’ दे दी जाती है। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार द्वारा भूमि खरीद का मामला हो या राजस्थान में मंत्री भागीरथ चौधरी पर लगा ग्रांट का आरोप, हर जगह पैटर्न एक जैसा है: पहले आरोप, फिर IT-ED का कोई नामो-निशान नहीं, और अंत में सबको क्लीन चिट।
हिंदुत्व की राजनीति और ‘भानुमति का पिटारा’
अयोध्या का यह दान घोटाला इसलिए भी अनूठा है क्योंकि यह पहली बार है जब भगवान के भक्तों ने ही ‘रक्षकों’ पर दान की चोरी का आरोप लगाया है। यह ‘हिंदुत्व’ की राजनीति करने वाली पार्टी के लिए एक वैचारिक संकट है। अब मथुरा में भी इसी तरह की आवाजें उठने लगी हैं, जहां ‘फलाहारी बाबा’ जैसे लोग भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर दान की लूट का आरोप लगाकर CBI जांच की मांग कर रहे हैं। क्या यह ‘भानुमति का पिटारा’ खुल चुका है? क्या वे शक्तियां, जिन्होंने हिंदुत्व को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया, अब उसी सत्ता के लिए कांटा बन रही हैं?
दिल्ली और लखनऊ के बीच छिपी जंग?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि अयोध्या की यह घटना केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि दिल्ली और लखनऊ के बीच बढ़ते सत्ता संघर्ष का प्रतिबिंब है। अगले साल होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव से पहले, योगी आदित्यनाथ की चेतावनी कि “पारंपरिक मूल्यों से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा”, क्या विपक्ष के लिए है या यह अपने ही खेमे में किसी अंदरूनी लड़ाई का संकेत है? प्रधानमंत्री की चुप्पी और योगी की सक्रियता के बीच का यह फासला स्पष्ट करता है कि राम मंदिर के नाम पर शुरू हुई राजनीति अब अपनी ही नींव को हिला रही है। भगवान राम के नाम पर एकत्रित कोष यदि लूट का केंद्र बन जाए, तो उस देश की नैतिक सत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब देखना यह होगा कि क्या SIT की जांच सच को बाहर लाएगी या यह भी फाइलों की धूल में दफन हो जाएगा।
Read more : Donation Controversy : राम मंदिर चंदा चोरी विवाद के बीच गुटबाजी तेज, चंपत राय को लेकर बढ़ी सियासी हलचल












