बिलासपुर में एक परिवार के सामाजिक बहिष्कार के आरोपों के बाद मामला तूल पकड़ गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने पादरी समेत चर्च से जुड़े छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। आखिर आरोप क्या हैं और पुलिस किन पहलुओं की जांच कर रही है?
बिलासपुर में एक परिवार के सामाजिक बहिष्कार के आरोपों के बाद मामला तूल पकड़ गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने पादरी समेत चर्च से जुड़े छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। आखिर आरोप क्या हैं और पुलिस किन पहलुओं की जांच कर रही है?

Bilaspur News : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सामाजिक बहिष्कार का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है, जिसने धार्मिक समुदाय के भीतर हलचल मचा दी है। जिले के कोटा क्षेत्र स्थित मिशन कंपाउंड के निवासी हरीश लाल ने चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया (CNI) के पादरी और छह अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) के निर्देश पर 2 जुलाई को सात आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। पुलिस की यह कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता (BNS), सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत की गई है।


एएसपी (ग्रामीण) मधुलिका सिंह ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि शिकायतकर्ता हरीश लाल, जो स्वयं इस समुदाय के सदस्य हैं, ने अपनी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए हैं। हरीश लाल का दावा है कि चर्च की नई समिति का गठन होने के बाद से ही उन्हें और उनके परिवार को चर्च की सभी गतिविधियों से अलग-थलग कर दिया गया। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि उन्हें पिछले दो वर्षों से लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। इस उत्पीड़न का मुख्य केंद्र 17 जनवरी को हुई एक बैठक को बताया गया है, जहाँ उन्हें बिना किसी कानूनी अधिकार या उचित प्रक्रिया के “अच्छी स्थिति में नहीं” (Not in Good Standing) घोषित कर दिया गया, जिसके बाद उनका पूरी तरह से सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।

हरीश लाल ने अपनी शिकायत में यह भी स्पष्ट किया है कि केवल चर्च तक ही बहिष्कार सीमित नहीं था, बल्कि इसे सोशल मीडिया के माध्यम से भी बढ़ावा दिया गया। आरोप है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे संदेश प्रसारित किए गए, जिनमें समुदाय के अन्य सदस्यों से हरीश लाल के परिवार के साथ सभी सामाजिक संबंध तोड़ने की अपील की गई। इस प्रकार के संदेशों ने उन्हें न केवल मानसिक आघात पहुंचाया, बल्कि समाज के बीच उनकी छवि को भी धूमिल किया। शुरुआती दौर में जब स्थानीय पुलिस से शिकायत करने के बाद भी उन्हें कोई उचित राहत नहीं मिली, तो उन्होंने न्याय के लिए न्यायालय की शरण ली।
शिकायतकर्ता द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने के बाद, ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) दीप्ति बरवा ने मामले की गंभीरता को समझा। अदालत ने आरोपों पर संज्ञान लेते हुए कोटा पुलिस को तत्काल प्रभाव से FIR दर्ज करने का स्पष्ट निर्देश दिया। न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए पुलिस ने अब आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है। बिलासपुर पुलिस का कहना है कि वे इस मामले से जुड़े सभी साक्ष्यों की बारीकी से जांच कर रहे हैं। इस घटना ने समाज में प्रचलित बहिष्कार जैसी कुरीतियों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है, जहाँ एक परिवार को समुदाय से बाहर करने के लिए तकनीक और पद का दुरुपयोग किया गया। पुलिस अब आगे की कानूनी कार्यवाही कर रही है।
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