China-Russia: अरुणाचल से 2500 किमी दूर चीन-रूस का नया दांव, भारत की बढ़ी सामरिक चिंता

China-Russia:  चीन और रूस के बीच गहरे होते सैन्य संबंधों की कड़ी में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। बीजिंग और मॉस्को ने घोषणा की है कि अगले हफ्ते चीन के तटीय शहर किंगदाओ के पास एक बड़ा संयुक्त नौसैनिक अभ्यास आयोजित किया जाएगा। यह इलाका यलो सी (पीला सागर) के अंतर्गत आता है, जो रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीनी रक्षा मंत्रालय और रूसी मीडिया के अनुसार, इस अभ्यास में दोनों देशों की नौसेनाएं समुद्र और आकाश दोनों मोर्चों पर अपनी युद्ध कौशल का प्रदर्शन करेंगी।

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यह अभ्यास 6 जुलाई से 13 जुलाई तक चलेगा। बयान में स्पष्ट किया गया है कि युद्धाभ्यास के समापन के बाद, दोनों देशों की नौसेनाएं प्रशांत महासागर के विशिष्ट क्षेत्रों में संयुक्त समुद्री गश्त भी करेंगी। रूसी प्रशांत बेड़े के अत्याधुनिक युद्धपोत, जिसमें एक क्रूज़र, एक कॉर्वेट, एक डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी और एक बचाव पोत शामिल हैं, पहले ही किंगदाओ पहुंच चुके हैं।

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युद्धाभ्यास का आधिकारिक उद्देश्य और महत्व

दोनों देशों के आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह वार्षिक सैन्य अभ्यास का एक हिस्सा है, जिसका मुख्य उद्देश्य “सुरक्षा चुनौतियों का मिलकर सामना करना और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता बनाए रखना” है। हालांकि, कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल नियमित अभ्यास नहीं है। किंगदाओ की भौगोलिक स्थिति, जो दक्षिण कोरिया, जापान और ताइवान के करीब है, इस युद्धाभ्यास को विशेष महत्व देती है। अमेरिका के इन प्रमुख सहयोगियों के करीब चीन और रूस की संयुक्त शक्ति का प्रदर्शन सीधे तौर पर वाशिंगटन और उसके क्षेत्रीय मित्रों को एक कड़ा संदेश देने के रूप में देखा जा रहा है। यह अभ्यास दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद चीन और रूस का सैन्य गठबंधन और अधिक प्रगाढ़ होता जा रहा है।

भारत के लिए क्यों बढ़ रही है रणनीतिक चिंता?

चीन और रूस की बढ़ती नजदीकी भारत के लिए कूटनीतिक और रक्षात्मक दृष्टिकोण से एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। भारत, जो लंबे समय से रूसी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, अपनी रक्षा जरूरतों के लिए आज भी 60 प्रतिशत तक रूसी उपकरणों पर निर्भर है। भारत के लिए चिंता के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • गोपनीयता का खतरा: भारत को आशंका है कि रूस के साथ घनिष्ठ सैन्य सहयोग के कारण चीन रूसी रक्षा उपकरणों की तकनीकी और रणनीतिक बारीकियों (शक्ति और कमजोरियों) तक पहुंच बना सकता है। इससे भारतीय सेना की युद्ध क्षमता का आकलन चीन के लिए आसान हो जाएगा।

  • आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव: भारत का पुराना मित्र रूस यदि कभी चीन के दबाव में आता है, तो वह संकट के समय भारत को हथियारों की आपूर्ति रोक सकता है या समर्थन वापस ले सकता है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम है।

  • भू-राजनीतिक बदलाव: रूस का चीन की ओर झुकाव भारत के पारंपरिक संतुलन को बिगाड़ रहा है, जिससे भविष्य में क्षेत्रीय शक्ति समीकरणों के बदलने की संभावना है।

निष्कर्ष और आगे की राह

यह नौसैनिक अभ्यास इस बात का संकेत है कि वैश्विक ध्रुवीकरण तेजी से हो रहा है। चीन और रूस एक साझा एजेंडे पर काम कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर पश्चिमी प्रभाव को सीमित करने का प्रयास है। भारत के लिए अब समय आ गया है कि वह अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता को और अधिक गति दे और अपनी कूटनीतिक सक्रियता को बढ़ाते हुए रूस के साथ अपने संबंधों को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करे। क्या आपको लगता है कि रूस के साथ बढ़ते सैन्य तालमेल के कारण चीन भारत की सीमाओं पर और अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है?

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Chandan Das

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