ईरान और अमेरिका के बीच तनाव उस समय चरम पर पहुंच गया जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन तेल टैंकरों पर हमले के बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान में स्थित कई सैन्य ठिकानों पर भीषण जवाबी हमले किए। इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच पहले से ही जारी शांति वार्ता की भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इस सैन्य कार्रवाई ने मध्य-पूर्व में सुरक्षा स्थितियों को और अधिक जटिल बना दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

तुर्किये में नाटो समिट के दौरान ट्रंप का आक्रामक रुख
नाटो समिट में भाग लेने के लिए तुर्किये पहुंचे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रति अपनी नीति में स्पष्ट और आक्रामक बदलाव के संकेत दिए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब उनके लिए ‘मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MOU) का कोई अस्तित्व नहीं है और वे अब किसी भी तरह की नई डील के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने ईरान के नेतृत्व को लेकर बेहद सख्त भाषा का उपयोग करते हुए कहा कि उनसे बातचीत करना ‘समय की बर्बादी’ है। ट्रंप ने चेतावनी दी कि यदि इन लोगों के हाथ परमाणु हथियार लग गए, तो यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी त्रासदी होगी।

‘बीमार लोग हैं’: ट्रंप की ईरान पर तीखी टिप्पणी
नाटो समिट के दौरान अपने संबोधन में राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछली रात किए गए सैन्य हमलों का जिक्र करते हुए ईरान के शासन को ‘खतरनाक’ करार दिया। उन्होंने कहा कि ईरान में सत्ता पर काबिज लोग ‘बीमार’ मानसिकता के हैं और उनके व्यवहार में कुछ गंभीर खामियां हैं। ट्रंप का यह बयान ईरान के प्रति अमेरिका के अब तक के सबसे कड़े रुख को दर्शाता है। हालांकि, कड़ा रुख अपनाने के बावजूद, उन्होंने यह संकेत दिया कि भले ही ‘सीजफायर’ (युद्धविराम) के समझौते खत्म हो गए हों, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर बातचीत की खिड़की पूरी तरह बंद नहीं हुई है।

शांति वार्ता के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल
राष्ट्रपति ट्रंप के इन बयानों के बाद ईरान और अमेरिका के बीच चल रही पीस डील की बातचीत अब पूरी तरह से ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह रुख न केवल ईरान के साथ संबंधों को पूरी तरह से बदलने वाला है, बल्कि यह नाटो और अन्य वैश्विक शक्तियों के बीच भी नई बहस छेड़ने वाला है। एक तरफ सैन्य हमले और दूसरी तरफ कूटनीतिक संवाद के दरवाजे को आंशिक रूप से खुला रखने का ट्रंप का यह दोहरा रुख यह बताता है कि आने वाले दिनों में अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति अत्यंत आक्रामक और अप्रत्याशित होने वाली है।
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