Jagannath Rath Yatra : जगन्नाथ पुरी के गजपति महाराज ने राष्ट्रपति-पीएम को लिखा पत्र, रथयात्रा पर उठाया बड़ा सवाल

Jagannath Rath Yatra :  ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने रथयात्रा की प्राचीन परंपराओं की शुचिता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इस संबंध में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। गजपति महाराज, जो श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भी हैं, ने इस्कॉन (ISKCON) द्वारा अपनी सुविधानुसार अलग-अलग तिथियों पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने की कड़ी आलोचना की है। उनका स्पष्ट मानना है कि शास्त्रों में रथयात्रा के लिए निर्धारित तिथियां और नियम अचूक हैं, जिनका पालन न करना भक्तों की भावनाओं को आहत करने और धार्मिक परंपराओं को कमजोर करने जैसा है।

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गजपति महाराज का महत्व और परंपरा का निर्वहन

पुरी के वर्तमान गजपति महाराज दिव्यसिंह देव को जगन्नाथ संस्कृति में ‘ठाकुर राजा’ के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें भगवान जगन्नाथ का प्रमुख सेवक माना जाता है, और उनकी भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है। रथयात्रा के दौरान ‘छेरा पंहरा’ यानी सोने की झाड़ू से रथों को बुहारने की पवित्र रस्म उन्हीं के द्वारा संपन्न की जाती है। 1970 में 17 वर्ष की अल्पायु में राज्याभिषेक प्राप्त करने वाले और कानून के ज्ञाता महाराज दिव्यसिंह देव का यह कदम उनकी इस जिम्मेदारी का प्रतीक है कि वे भगवान जगन्नाथ की सदियों पुरानी संस्कृति और शास्त्रों में वर्णित नियमों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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विवाद का मुख्य कारण: इस्कॉन की अलग तिथियां और शास्त्र विरुद्ध आयोजन

विवाद की जड़ तब गहरी हुई जब इस्कॉन ने पुरी की मुख्य रथयात्रा (जो 16 जुलाई को निर्धारित है) से काफी पहले दुनिया के कई हिस्सों में रथयात्रा निकाल ली। इस्कॉन ने लंदन, न्यूयॉर्क और सिडनी जैसे शहरों में जून और जुलाई की शुरुआत में ही ये आयोजन किए। गजपति महाराज ने विशेष रूप से उज्जैन स्थित इस्कॉन मंदिर की उस योजना पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके तहत मध्य प्रदेश के 66 स्थानों पर 16 से 25 जुलाई के बीच रथयात्राएं निकालने की तैयारी थी। महाराज का तर्क है कि ‘स्कंद पुराण’ और अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार, रथयात्रा केवल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ होने वाला नौ दिवसीय उत्सव है। मनमाने समय पर आयोजन करना प्राचीन परंपराओं और शास्त्रों की मर्यादा के विपरीत है।

इस्कॉन का पक्ष: वैश्विक विस्तार और स्थानीय परिस्थितियां

दूसरी ओर, इस्कॉन का कहना है कि भगवान जगन्नाथ की भक्ति और संस्कृति का प्रसार वैश्विक स्तर पर करना ही उनका उद्देश्य है। इस्कॉन के अनुसार, प्रत्येक देश की जलवायु, सरकारी नियम, स्थानीय सांस्कृतिक कारक और भक्तों की उपलब्धता भिन्न होती है। उदाहरण के तौर पर, रूस जैसे देशों में वहां की कठोर जलवायु परिस्थितियों और सरकारी नियमों के कारण हमेशा पंचांग के अनुसार तिथियों का पालन करना संभव नहीं होता। इस्कॉन का तर्क है कि इन आयोजनों का मुख्य ध्येय अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को भगवान जगन्नाथ की महिमा से जोड़ना और वैश्विक स्तर पर इस उत्सव की दिव्यता को पहुंचाना है।

बार-बार उठ रहे सवाल: क्या कोई सर्वमान्य समाधान संभव है?

यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2024 और 2025 में भी गजपति महाराज ने इस्कॉन से अनुरोध किया था कि वे विदेशों में भी पुरी के पंचांग का पालन करें। लेकिन 2026 में यह मुद्दा अधिक सार्वजनिक हो गया है क्योंकि तिथियों में अंतर बहुत अधिक बढ़ गया है। जहां पुरी मंदिर प्रशासन धर्मग्रंथों की कठोरता पर अडिग है, वहीं इस्कॉन व्यवहारिक सीमाओं और वैश्विक विस्तार को प्राथमिकता दे रहा है। यह टकराव अब एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श का रूप ले चुका है, जिसमें यह प्रश्न मुख्य है कि क्या प्राचीन परंपराओं के संरक्षण और आधुनिक वैश्विक विस्तार के बीच कोई मध्य मार्ग निकाला जा सकता है।

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Chandan Das

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